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बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी मां...

Sun, 12 May 2013 05:30 AM IST
Mathura
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बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी मां,
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याद आती है चौका-बासन चिमटा फुकनी जैसी मां।
बान की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे,
आधी सोयी आधी जागी थकी दोपहरी जैसी मां॥
- निदा फाजली
मथुरा। मां....। ये शब्द होठों पर आते ही वातावरण में एक अलग सुगंध घुल जाती है। उम्र चाहे पांच की हो, 55 की या 75 की इंसान खुद को बच्चा समझने लगता है। इसके पास हर दुख-दर्द की दवा है, इसके आंचल में गहरा सुकून मिलता है। संसार रूपी बगिया मां रूपी पुष्प के बिना सूनी है या ये कहें कि अस्तित्व ही नहीं है। किसी ने उस मां में ईश्वर को देखा तो किसी ने उसमें प्रेमिका को देखा। वो है ही ऐसी, उसी से तो सारे रिश्ते-नाते शुरू होते हैं और उसी पर समाप्त। मदर्स-डे की पूर्व संध्या पर अमर उजाला ने कुछ मांओं के संघर्षपूर्ण जीवन को शब्दों में ढालने का प्रयास किया है। वहीं आपको याद दिलाने की भी कोशिश है कि इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी में उस मां के महात्याग को कहीं भूल न जाएं। जिसने अपना पूरा जीवन तुम्हारा जीवन संवारने में न्योछावर कर दिया आज कुछ वक्त उस मां के लिए वक्त जरूर निकालें।

तुम ही तो हो मेरी सबकुछ...
(फोटो-1 जगजीत कौर, जगजीत कौर, दो बेटियों की मां)
साल 1997, जीवन का कुठाराघात था या ऊपरवाले का प्रकोप पता नहीं, पर जिंदगी का ठहराव जरूर था। बड़ी बेटी जब चार साल की थी और छोटी दो की तो इनके पापाजी का स्वर्गवास हो गया। पहले बच्चियों के दादा जी थे तो समस्याएं कम थीं, उनके जाने के बाद जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गई। कठिनाइयों से जंग लड़ने के लिए दो बेटियां संबल बनीं। बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते-पढ़ाते आंखों में बेटियों के लिए सपने पलने लगे, मेहनत और बढ़ाई ताकि बच्चों को कभी पिता की कमी न महसूस हो। आज बड़ी बेटी एम कॉम कर रही है और छोटी बेटी सीए की तैयारी। बेटी कभी-कभी कहती है मां एक भाई होता तो कितना अच्छा होता, पर मैं कहती हूं कि तुम ही तो मेरा बेटा हो, मेरी आशा। मेरा जीवन तो शुरू ही तुमसे होता है।
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थकी दोपहरी जैसी साइकिल वाली अम्मा..
साड़ी पहने, साइकिल के पैडलों को जोर से दबाते हुए, लकड़ियों के गट्ठर ले जाती ये अम्मा बरफी हैं। अपना और अपने बच्चों का पेट पालने के लिए 21 वीं सदी से दो-दो हाथ करती अम्मा का संघर्ष वर्षों से जारी है। अम्मा बताती हैं कि उन्हें गुजरे बीसों साल हो गए। बच्चे हैं उन्हें ऐसे ही लकड़ी काट काटकर पाला है। और तो कुछ होता नहीं शुरू से लकड़ियां काटी तो उनके जाने के बाद इसी से गुजारा करने का रास्ता निकाल लिया। एक बेटे को आगरा काम सिखाने भेज दिया है। हम यहां काम करती हैं। आगे कहती हैं बच्चों के लिए आखिरी सांस तक संघर्ष जारी रखूंगी। आखिर इन बच्चों की मां हूं मैं।
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झुर्रियों वाले चेहरे पर अब शांति की चमक है
किशोर उम्र से वृद्धावस्था तक मां और पिता के कर्तव्य निभाकर जीवन के बचे लम्हों को वृंदावन की शांति में बिता रहीं हैं अम्मा। बुढ़ापे की झुर्रियों वाले चेहरे पर अब शांति की चमक है। युवावस्था में पति चले गए, आंचल से लिपटते पांच बच्चे, घर से बेसहारा और अनपढ़ होने का दंश बचा था। घटना के बाद मुख्यमंत्री तक घर क्या झोंपड़ी पर पहुंचे, पर बदनसीबी घेर रही थी। कानपुर को छोड़कर वृंदावन पहुंची। पांच बच्चों को पालने के लिए दूसरों के घरों में चौका, बर्तन, झाड़ू, पोंछा किया, रोटी बनाई। पर बच्चों को पहलु में संभाले रखा। आज बच्चे अपने कदमों पर खड़े हो उड़ान भर रहे हैं। और मां शांतिवास, प्रभु के चरणों में।
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