गांव दौसेरस की खूनी रंजिश का खेल वर्षों पुराना है। दुश्मनी की यह आग शमीम, बबली और मिश्रा गुट के बीच जल रही है। एक गुट में किसी की हत्या होने पर दूसरा तत्काल बदला लेने की स्क्रिप्ट लिख डालता है। मिश्रा गुट तो अब खामोश हो गया लेकिन शमीम और बबली अभी भी एक दूसरे के खून के प्यासे हैं।
लड़ाई वर्चस्व की है। चाहें कोई चुनाव हो या फिर गांव की सियासत का कोई दूसरा मुद्दा हमेशा गुटबाजी सामने आ जाती है। बीते साल 11 मार्च को जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जतीपुरा में आए थे उस दिन भी दौसेरस में मिश्रा गुट और शमीम गुट के बीच आमने-सामने फायरिंग हुई थी। इसमें तीन लोगों की मौत हो गई थी। मरने वालों में एक मिश्रा गुट का था तो दो शमीम गुट के। तीन हत्याओं के बाद गांव में महीनों तक फोर्स तैनात रही। एक और गुट बबली ने बना लिया है। तीन दिन पहले ही बबली गुट के एक आदमी के पैर में गोली लगी थी। हालांकि थाना स्तर पर मामले को दबा दिया गया।
शमीम के पिता की हत्या के बाद शुरू हुई गैंगवार
बताया जाता है कि दस साल पहले मिश्रा गुट के लोगों ने शमीम के पिता भागमल खां की हत्या कर दी थी। यह वारदात भी दो गुटों के बीच हुई मारपीट बाद की गई। पिता की मौत का बदला शमीम ने मिश्रा गुट के आदमी को मारकर लिया। बस ऐसे ही हत्या दर हत्या का सिलसिला शुरू हो गया। आज जिस शहजाद का कत्ल हुआ है, उसका आरोप बबली गुट पर है।
दस दिन पहले हुई थी पंचायत
बबली और शमीम गुट के बीच चली आ रही रंजिश ने गांव की शांति को भंग कर दिया है। पूरा गांव गुटों में बंट गया है। इस रंजिश को खत्म कराने के लिए दस दिन पहले ही गांव में पंचायत हुई थी। बबली और शमीम गुट के लोग इसमें पहुंचे। दोनों से कहा गया था कि दुश्मनी छोड़कर प्रेम भाव से रहें। इस पंचायत में शहजाद भी पहुंचा था। बताया जाता है कि जब बबली ने कहा कि वह अब किसी ने दुश्मनी नहीं मान रहा है तो शहजाद ने कुछ तेज आवाज में कह दिया। इस पर भी तनातनी हो गई थी। शहजाद के कत्ल को भी इसी वारदात से जोड़ा जा रहा है।
पुलिस पर लापरवाही का आरोप
दौसेरस के हालातों के लिए पुलिस पर भी खूब आरोप लगते रहे हैं। गांव में रंजिश बढ़ने की प्रमुख वजह पुलिस की लापरवाही मानी जा रही है। अगर पुलिस ने शुरूआत में ही दोनों गुटों पर सख्त कार्रवाई की होती तो आज यह हालात न होते। कई बार तो पुलिस के सामने फायरिंग होती रही लेकिन खाकी मूकदर्शक बनी रही।