फलों के राजा आम की पैदावार को लेकर उत्पादकों का रुझान कम हो रहा है। लगातार क्षेत्रफल भी घट रहा है। इसकी प्रमुख वजह आम की कीमतों में बारिश के बाद आने वाली कमी को माना जा सकता है। उद्यान विभाग के मुताबिक आम का उत्पादन अब न्यूनतम की श्रेणी में है। वहीं गैर जिलों और प्रांतों से बड़ी तादाद में आम का आयात हो रहा है।
फलों के राजा आम के उत्पादन को लेकर कृषकों के उत्साह में खासी कमी दर्ज की गई है। मौजूदा समय में 30 से 40 हेक्टेयर के क्षेत्रफल में ही आम की पैदावार हो रही है। बीते दस वर्षों में क्षेत्रफल के साथ ही उत्पादन में भी गिरावट आई है। जिले में आम की चार प्रजातियां मुख्य रूप से पाई जाती हैं। इनमें दशहरी, चौसा, सफेदा और आम्रपाली किस्म के आम शामिल हैं। महाराष्ट्र से आयात होने वाले आल्फांसो की मांग भी जिले में खासी है। देशी आम की पैदावार तो हो रही है लेकिन बीज से पैदा होने वाली इस किस्म में गुणवत्ता और खराब होने की संभावना अधिक होने के कारण उत्पादकों को अक्सर घाटा उठाना पड़ता है। पड़ोसी जिला फर्रुखाबाद और मलियाबाद से भी आम का आयात किया जा रहा है, लेकिन बरसात होने के साथ ही आम के दामों में गिरावट आना भी एक बड़ी समस्या है। जिले में आम की किस्मों के उत्पादनकर्ताओं को हर वर्ष बरसात में कम कीमत के चलते नुकसान भी उठाना पड़ता है। जबकि गैर जिलाें और प्रांतों से आए आम की कीमतें आयात के समय ही निर्धारित होती हैं। इसलिए बाहरी उत्पादकों को नुकसान से कोई फर्क नहीं पड़ता। कुल मिलाकर आम के प्रति उत्पादकों का रुझान कम होना जिले में होने वाली चार किस्मों पर आने वाले समय में संकट की स्थिति खड़ा कर सकता है।
पैदावार तो अच्छी होती है पर पड़ती है मौसम की मार
आम की पैदावार कर रहे किसान श्यामबाबू का कहना है कि 20 बीघा में उनके आम के बाग हैं। प्रतिवर्ष वो आम की पैदावार करते हैं। पैदावार अच्छी होती है लेकिन हर बार आंधी और बारिश की मार से काफी नुकसान हो जाता है।
मैनपुरी-कुरावली मार्ग पर करीब 15 बीघा में आम की पैदावार कर रहे रामरतन ने बताया कि उनकी कई पीढ़ियां आम की पैदावार करती आ रही हैं। बीते 10 वर्ष में उन्होंने लागत के अनुरूप फायदा न होने के चलते अब नौ बीघा में ही आम की पैदावार शुरू कर दी है। बाकी भूमि पर अन्य फसल की पैदावार की जा रही है।
बीते दो दशक में आधा रह गया क्षेत्रफल
मौजूदा समय में 30 से 40 हेक्टेयर क्षेत्रफल में ही आम की पैदावार हो रही है। इसका प्रमुख कारण अन्य लाभकारी फसलों की पैदावार के प्रति उत्पादकों का उन्मुख होना भी है। जबकि दो दशक पूर्व आम की पैदावार का क्षेत्रफल 60 से 70 हेक्टेयर तक रहा है।
उत्पादकों को बागों का सही ढंग से प्रबंधन करना होगा। बाग के पुराने और घने होने पर उत्पादन क्षमता कम हो जाती है और गुणवत्ता भी अच्छी नहीं रहती है। इसलिए उत्पादकों को इस ओर ध्यान देना होगा। ताकि पैदावार अच्छी और समय पर हो सके।
डॉ. विकास रंजन चौधरी, वैज्ञानिक उद्यान, कृषि विज्ञान केंद्र