महोबा। हीमोफीलिया एक ऐसी बीमारी है, जिसमें शरीर के बाहर बहता हुआ रक्त जमता नहीं है। ऐसे में शरीर पर लगी कोई गंभीर चोट जानलेवा भी साबित हो सकती है क्योंकि चोट से रक्त के बहने पर बंद ही नहीं होता। यह बीमारी रक्त में थ्राम्बोप्लास्टिन नामक पदार्थ की कमी से होती है।
थ्राम्बोप्लास्टिन में खून को शीघ्र थक्का कर देने की क्षमता होती है। खून में इसके न होने से खून का बहना बंद नहीं होता है। यह बातें विश्व हीमोफीलिया दिवस की पूर्व संध्या पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. सुधाकर पांडेय कहीं।
सीएमओ ने कहा कि खून का बहना न रुकने को ‘क्लॉटिंग फैक्टर’ कहते हैं। इस फैक्टर की विशेषता यह है कि यह बहते हुए खून के थक्के जमाकर उसका बहना रोकता है। इस रोग में रोगी के शरीर के किसी भाग में जरा सी चोट लग जाने पर बहुत अधिक मात्रा में खून का निकलना आरंभ हो जाता है।
इससे रोगी की मृत्यु भी हो जाती है। उन्होंने बताया कि बच्चों को हीमोफीलिया की बीमारी अपने माता-पिता से विरासत में मिलती है। इसके मरीजों में फैक्टर 8 की कमी होती है, जिससे शरीर में कटने या खरोंच लगने पर रक्त लगातार बहता है।
शरीर में इस फैक्टर की कमी होने पर जोड़ों में तेज दर्द होता है। दर्द असहनीय होने पर बच्चे चिल्लाने लगते हैं और बेचौनी बढ़ जाती है। फैक्टर 8 एक आवश्यक रक्त-थक्का बनाने वाला प्रोटीन है, जिसे एंटी-हीमोफिलिक कारक के रूप में भी जाना जाता है।
हीमोफीलिया बीमारी दो तरह की होती है हीमोफीलिया ए और हीमोफीलिया बी। यह एक अनुवाशिंक बीमारी होती है। इस बीमारी में शरीर में रक्त के थक्के बनने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है, जिसके कारण, चोट लगने पर रक्त जम नहीं पाता और वह असामान्य रूप से बहता रहता है।
इस बीमारी पर तब तक लोगों का ध्यान नहीं जाता, जब तक कि उन्हें किसी कारण से गंभीर चोट न लगे और उनमें रक्त का बहना न रुकें।
चोट लगने पर लंबे समय तक खून बहना, शरीर के किसी भी भाग पर बार-बार नीले चकत्ते पड़ना, सूजन के स्थान पर गर्माहट और चिनचिनाहट होना, मसूढ़ों या जीभ में चोट लगने पर लंबे समय तक खून रिसना, शरीर के जोड़ों, घुटनों, एड़ी, पेशाब के साथ खून आना आदि लक्षण हैं।