बुंदेलखंड में धरती के सूख जाने से जल स्तर 30 फीट नीचे पहुंच गया है। बांध, तालाब और पोखरों ने जवाब दे दिया है। जिले भर में पानी को लेकर मारामारी मची हुई है। ऐसे में प्राचीन कुएं ग्रामीणों की प्यास बुझाने के लिए जीवनदायिनी बन गए हैं।
तीन सालों से बारिश न होने के कारण जिले के हालात बदतर होते जा रहे है। हालत यह है कि खेतों में न तो बुवाई हो सकी है, और न ही कहीं पर पानी का पुख्ता इंतजाम किया गया है। कई कस्बों और गांव की पेयजल आपूर्ति पूरी तरह ठप हो गई है। जिला प्रशासन टैंकरों से पानी भेजकर लोगों की प्यास बुझा रहा है, लेकिन टैंकरों से मिल रहा पानी ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रहा है।
ग्रामीण अंचलों के 60 फीसदी से ज्यादा हैंडपंपों ने जवाब दे दिया है, वहीं तमाम हैंडपंप का जल स्तर नीचे खिसक जाने से हैंडपंपों ने पानी मिलना बंद है। जिले में उपेक्षित और जीर्णशीर्ण पड़े कुएं संकट के समय में लोगों का साथ दे रहे है। यही वजह है कि अब प्राचीन कुओं ने पानी भरने के लिए लोगों की भारी भीड़ जुट रही है। करोड़ों रुपये की लागत से गांव गांव में लगाए गए हैंडपंप शोपीस बनकर रह गए है।
नगर में बढ़ती पेयजल समस्या को देखते हुए टैंकरों से पानी की आपूर्ति की जा रही है। साथ ही खंडहर पड़े प्राचीन कुओं की साफ सफाई और मरम्मत कराकर कुओं के पानी को उपयोग में लाया जाएगा। कुओं की सफाई के लिए बोर्ड की बैठक में बजट भी स्वीकृत करा लिया है। पानी देने वाले प्राचीन कुओं का पहले चरण में चयन किया गया है। पुष्पा अनुरागी, नगर पालिका अध्यक्ष