महोबा। मौलाना इदरीस रजा कटनी ने शहीदाने कर्बला हजरत इमाम हुसैन पर रोशनी डालते हुए कहा कि इमाम हुसैन पूरी दुनिया के इमाम थे। वह मोहर्रम की पहली तारीख को शहर के मोहल्ला मकनियापुरा के इमाम चौक परिसर में जलसे को खिताब कर रहे थे। उन्हाेंने कहा कि कयामत के दिन हुजूर सल्लल्लाहो अलैहवसल्लम से निसबत रखने वाले दामन-ए-मुस्तफा में समा जाएंगे। उन्हाेंने कहा कि कर्बला शरीफ में इमाम की इमामत से यजीद को खतरा था। इसीलिए पहले उसने इमाम हुसैन को मोहर्रम की दसवीं तारीख को शहीद कर दिया और इमाम जैनुल आबदीन के पैराें में बेड़ियां डाल दी थीं लेकिन जैसे ही जैनुल आबदीन को कत्ल करने के लिए जालिम तलवार लेकर पहुंचा, बीबी जैनब सामने खड़ी हो गईं और पहले खुद को कत्ल करने के लिए कहा जिससे जालिम भाग गया और जैनुल आबदीन को हजरत इमाम हुसैन के बाद इमामत मिली। उन्हाेंने कहा कि इमामत बीबी जैनब ने बचाई थी।
आलिम मौलाना ने तकरीर में कहा कि मां-बाप की तालीम तरबियत और माहौल का बच्चाें पर असर पड़ता है। उन्हाेंने कहा कि गौस-ए-आजम अब्दुल कादिर जीलानी की मां ने गर्भ के समय कुरान की तिलावत की थी। तब गौस-ए-आजम ने मां के पेट में ही 17 पाराें का हिब्ज कर लिया था। इसी तरह अभिमन्यु ने मां के गर्भ में ही चक्रव्यूह की रचना सीख ली थी लेकिन मौजूदा दौर में मांएं टीवी और नाच गानाें में मशगूल रहती हैं। यही वजह है कि बच्चे भी डांस और नाच गाना सीख रहे हैं। उन्हाेंने कहा कि इस्लाम ने फिजूल खर्च करने को मना किया है। कहा कि मेेहंदी लगाना मर्द के लिए हराम है। आज लोग शादी ब्याह में सबसे पहले दूल्हे को मेहंदी लगाते हैं। कार्यक्रम की निजामत मौलाना नौशाद साहब ने की। कार्यक्रम को सफल बनाने में मजीद अंसारी, शफीक अंसारी, बली मंसूरी, अतीकुर्रहमान, फरीद ने सहयोग किया।