महराजगंज। ग्रामीण क्षेत्रों में माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के एजेंट गरीब, अशिक्षित और मध्यमवर्गीय महिलाओं को झांसे में लेकर लोन के जाल में फंसा देते हैं। इससे उबर पाना मुश्किल होता है।
हर गांव में टीम बनाकर एजेंट महिलाओं को बेटियों के विवाह में सहायता और इलाज आदि जरूरतें पूरी करने के लिए कर्ज दिलाते हैं। आसानी से ऋण मिलने के कारण कोई हिचकता नहीं है, लेकिन किस्त की वसूली में एजेंटों का वास्तविक स्वरूप सामने आ जाता है। बैदा गांव के भाने भारती ने बताया कि माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के एजेंट हर गांव में महिला दलालों की टीम बना चुके हैं। ये विशेष रुप से अनुसूचित जाति और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों की महिलाओं को निशाना बनाती हैं।
उन्हें विवाह अनुदान, चिकित्सा सहायता या अन्य सरकारी लाभ का झांसा देकर लोन के लिए प्रेरित किया जाता है। पहले कुछ महिलाओं को नकद पैसे भी दिए जाते हैं, जिससे बाकी महिलाओं का भरोसा जीत लिया जाता है। रतनपुरवा के अनिल, मोहद्दीनपु बृजेश, औरहिया गांव की संगीता, बैदा गांव के कोईल, रामनगर के जयराम, मुजुरी गांव के संतोष कुमार ने बताया कि ऐसे में मामलों में कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई है।
गांव की महिलाएं खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही हैं। अधिकतर महिलाएं अशिक्षा और जानकारी के अभाव में लोन के जाल में फंस जाती हैं, जिससे न केवल आर्थिक संकट बल्कि सामाजिक और पारिवारिक समस्याएं भी उत्पन्न हो रही हैं।
बिना दस्तावेज पर हस्ताक्षर, 24 घंटे में मिल जाती है रकम : लोन प्रक्रिया में महिलाओं से केवल आधार कार्ड, दो फोटो और बैंक पासबुक मांगा जाता है। फिर किसी कागज पर हस्ताक्षर करवा लिया जाता है, जिसकी जानकारी भी उन्हें नहीं होती। इसके बाद 24 घंटे के भीतर उनके बैंक खाते में लोन की राशि आ जाती है। पैसा निकालते ही एजेंट पहले महीने का ब्याज अपने पास रख लेते हैं और बीमा करवाने के नाम पर और पैसे कटवा लेते हैं। लोन लेने वाली महिलाओं को यह जानकारी नहीं दी जाती कि ब्याज दर कितनी होगी और भुगतान कैसे करना होगा।
भुगतान में देरी पर बढ़ते हैं ब्याज : लोन की किश्त समय पर नहीं देने पर एजेंट महिला के घर पहुंचकर दबाव बनाते हैं। तब महिलाओं को पता चलता है कि उन्होंने जितनी रकम ली है, उसके बदले उन्हें दोगुनी से भी ज्यादा राशि चुकानी पड़ेगी। इस स्थिति में महिलाएं मानसिक तनाव में आ जाती हैं और कई बार घरेलू विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।