महराजगंज। माइक्रो फाइनेंस कंपनियाें से कर्ज लेना महिलाओं के लिए मुसीबत बन गया है। शुरुआत में जरूरत पूरी होने पर उन्हें राहत जरूर मिली, लेकिन अब किस्त जमा करने में उनके पसीने छूटने लगे हैं। रकम वसूल करने के लिए आने वाले एजेंट घर आकर बदसलूकी करते हैं। उनकी बातों को बर्दाश्त कर महिलाएं किसी तरह से किस्त जमा करती हैं। कर्ज के बोझ को हल्का करने के लिए खेत व जेवर बिकना आम बात हो गई है। भिटौली थाना क्षेत्र के जड़ार में समूह की महिलाएं कर्ज लेकर किस्त जमा नहीं होने से परेशान हैं।
मिठौरा ब्लॉक के सेखुई गांव में कई महिलाओं ने इक्रो फाइनेंस कंपनी से कर्ज ले रखा है। ज्यादातर महिलाएं कर्ज के बोझ से परेशान हैं। सेखुई गांव की सादिकुन निशा ने बताया कि घर बनवाने के लिए दो-तीन कंपनी से कर्ज लिया। किस्त का दबाव बढ़ने पर पति रहमान दिल्ली काम करने चले गए। समूह की किस्त जमा करने के लिए एजेंट परेशान करने लगे। दो महीना पहले पति दिल्ली से घर आए हैं। एजेंट को किस्त जमा करने की बात कही तो दोनों में कहासुनी हो गई। इससे नाराज होकर वह मायके चली गई। इसी बीच पैसा न देने के कारण समूह के सदस्य उसके घर पहुंचे और गैस सिलिंडर, चूल्हा आदि उठाकर ले गए। एजेंटों का यह तरीका देकर पति को तनाव में आ गए। आमदनी नहीं होने के कारण किस्त जमा करने में परेशानी हो रही है। इधर-उधर से किसी तरह से व्यवस्था कर किस्त की रकम दी जा रही है। उन्होंने बताया कि समस्या दूर करने के लिए कर्ज ली, लेकिन उल्टा हो गया। अब तो समस्या बढ़ती ही जा रही है।
सोनबरसा की रहने वाली प्रमिला देवी ने बताया की माइक्रो फाइनेंस कंपनी के कलेक्शन एजेंट ने किस्त की राशि जमा करने के लिए लगातार दबाव बना रहा है। एजेंट ने पति से गाली-गलौज करते हुए रुपये जमा करने का दबाव बनाया। पति ने कर्ज की रकम देने में असमर्थता जताई और कुछ दिन बाद रुपये देने का आश्वासन दिया, लेकिन एजेंट ने एक न सुनी। उनके दबाव से मन अशांत हो गया है। घर में रहने के दौरान हमेशा डर लगता है कि एजेंट कभी भी आकर अपशब्द बोलने लगेंगे। समस्या बताने पर एजेंट सुनने को तैयार नहीं होते हैं।
बैदा बाजार की सीमा ने बताया कि एक साल के पहले माइक्रो फाइनेंस कंपनी से तीन किस्तों में 90 हजार रुपये लिए थे, लेकिन अत्यधिक ब्याज होने के कारण कर्ज डेढ़ लाख रुपये हो गया है। एक भी डिस्मिल खेत नहीं है। पति दशरथ दिल्ली में मजदूरी करते हैं। समूह के एजेंट घर आकर भुगतान के लिए परेशान करते हैं। जब ब्याज नहीं मिलता तो बदसलूकी पर उतर जाते हैं। बेटे का नामांकन कराने के लिए 15 हजार रखी थीं। उसे ही एजेंट हो दे दिया। अब तो बच्चे का स्कूल में नामांकन भी नहीं हो पाएगा। इन दिनों एजेंट दो दिन में एक बार जरूरी वसूली के आते हैं।
बैदा गांव की माया ने बताया कि एक साल पहले माइक्रो फाइनेंस से पांच किस्तों में डेढ़ लाख रुपये लिए थे। पति की उसी दौरान तबीयत खराब हो गई। सारा पैसा उनके इलाज में खर्च हो गया। ब्याज की दर अधिक होने के कारण पैसा भुगतान करने में परेशानी हो रही है। गांव किसी के घर पर एजेंट आ जाते हैं तो फिर घर छोड़कर इधर-उधर हटना पड़ता है। घर की माली हालत ठीक नहीं है। एजेंट जब घर पर आते हैं तो अपशब्द बोलते हैं। यह ठीक नहीं लगता है। कर्ज के बोझ तले दबे होने के कारण कहीं शिकायत भी करना उचित नहीं लगता है। कर्ज आसानी से मिल जाता है। इस वजह से कोई परेशानी नहीं होती है, लेकिन किस्त जमा करने के दौरान वसूली एजेंटों के खराब व्यवहार से परेशानी हो रही है। अनुरोध करने पर एजेंट कोई बात सुनते भी नहीं हैं।
जब तक कोई शिकायत नहीं मिलेगी, इस दिशा में कार्रवाई नहीं हो सकती। निगरानी के लिए टीम बनी है। समय-समय पर गोष्ठी के जरिए लोगों को जागरूक किया जाता है।
भूपेंद्र नाथ मिश्रा, लीड बैंक मैनेजर