जब हर शख्स हो ‘दशरथ मांझी’ तो कब तक पहाड़ बन रास्ता रोकती नदी
लक्ष्मीपुर (महराजगंज)। ‘दशरथ मांझी’ यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं। बिहार के गया जिले के गहलौर गांव के रहने वाले दशरथ मांझी ने अकेले दम पर पहाड़ को काटकर रास्ता बना दिया था, जिससे 55 किलोमीटर की दूरी सिमट कर 15 किलोमीटर रह गई थी। हुआ यह था कि दशरथ मांझी की पत्नी को उपचार की जरूरत थी, लेकिन वह उसे कस्बे तक नहीं ले जा पाए। कस्बा पहाड़ी की दूसरी और था। पत्नी की मौत के बाद दशरथ मांझी ने पहाड़ को काटकर सड़क बनाने की ठानी। लोगों से मदद की मांग तो सभी उन्हें पागल कहने लगे। ऐसे में मांझी ने छेनी और हथौड़ा उठाया और 22 साल के अथक प्रयास के बाद अपने सपने को साकार कर दिखाया। बृहस्पतिवार को लक्ष्मीपुर क्षेत्र के जंगल में में स्थिति टेढ़ी गांव के लोगों ने भी कुछ ऐसा ही जज्बा और जुनून दिखाया। गांव के कांधपुर, बेलौहा, ब्रह्मपुर समेत 13 टोले के आवागमन का एकमात्र साधन लकड़ी का पुल बाढ़ के पानी में बह गया था। ग्रामीणों ने अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की चौखट के चक्कर लगाए, फरियाद की, लेकिन कुछ होता नहीं दिखा तो खुद पर भरोसा करने की ठानी। मेहनत रंग लाई और मलाव नदी पर लकड़ी का पुल बनकर तैयार हो गया। जंगल के बीच बसा यह गांव चारों तरफ से प्यास, रोहिन और मलाव नदी से घिरा हुआ है।
गांव निवासी वेदप्रकाश, गोविंद, हरीनाथ चौधरी, राकेश, दुर्गेश, अमरजीत, सेतबान, अंगद चौहान, पप्पू, सुमेर सहानी, कमलेश सहानी, बिहारी, रामकयास, कमलेश, रमेश, धर्मेंद्र कुमार, हरी चौधरी, राम मिलन ने बताया कि बाढ़ में वे परेशानी झेलते रहे, लेकिन मदद नहीं मिली।
प्रधान कुसमावती ने कहा कि मलाव और रोहिन नदी के बीच बसा यह गांव भौगोलिक दृष्टि से अति पिछड़ा है। नदी पर पक्के पुल की जरूरत है। खंड विकास अधिकारी अनिल यादव ने बताया कि टेढ़ी गांव के लोगों की सबसे बड़ी परेशआनी संपर्क मार्ग व पुल की कमी है। समस्या से शासन को अवगत करा दिया गया है।