महराजगंज। दिवाली का पर्व नजदीक आते ही मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों के घरों में चाक की रफ्तार तेज हो गई है। पारंपरिक तरीके से दीये और मिट्टी के अन्य उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। बाजार में भी धीरे-धीरे इनकी मांग बढ़ने की उम्मीद है। कुम्हारों को आशा है कि इस बार दिवाली पर अच्छी बिक्री होगी और उनके कारोबार को सहारा मिलेगा।
मिट्टी के दीये भारतीय परंपरा और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। दिवाली पर घरों, मंदिरों और प्रतिष्ठानों में दीये जलाने की परंपरा आज भी कायम है। हालांकि, बढ़ती महंगाई और कच्चे माल की लागत ने कुम्हारों की चिंता बढ़ा दी है। मिट्टी लाने से लेकर उसे तैयार करने, दीये बनाने और पकाने तक में मेहनत और खर्च लगता है। ऐसे में बिक्री अच्छी होने पर ही परिवारों को बेहतर आमदनी की उम्मीद है।
विस्मिल नगर निवासी श्रीकिशुन प्रजापति ने बताया कि वह सिंदुरिया से मिट्टी खरीदकर लाते हैं। पांच हजार टाली मिट्टी मिलने के बाद उसे दीये और दूसरे उत्पाद बनाने योग्य बनाने के लिए धुलाई की प्रक्रिया से गुजारा जाता है। इसके बाद चाक पर मिट्टी को आकार देकर अलग-अलग तरह के बर्तन और दीये तैयार किए जाते हैं।
उनका कहना है कि मिट्टी के दीये खरीदने से न केवल परंपरा को बढ़ावा मिलेगा बल्कि स्थानीय कारीगरों की मेहनत का उचित मूल्य मिलने में भी मदद होगी।