कांग्रेस ने भी उत्तर प्रदेश में वोटों की फसल उगाने और सीटों की संख्या बचाने व बढ़ाने के लिए गुजरात कार्ड खेल दिया है।
उसने गुजरात की साबरकांठा सीट से लोकसभा सदस्य रहे मधुसूदन मिस्त्री को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है। भाजपा पहले ही गुजरात के ही अमित शाह को प्रदेश प्रभारी बना चुकी है।
माना जा रहा है कि भाजपा के यूपी में वोट व सीटें बढ़ाने के लिए खेले गए मोदी व गुजरात कार्ड के असर को कम करने के लिए मिस्त्री को यूपी की जिम्मेदारी दी गई है।
हालांकि कई वरिष्ठ कांग्रेसियों को मिस्त्री को प्रदेश प्रभारी बनाए जाने पर ताज्जुब भी हो रहा है।
इनकी समझ में नहीं आ रहा है कि जिस व्यक्ति को गुजरात के ही कांग्रेसी बाहरी मानते हैं, उसे उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी अपना कैसे मानेंगे।
कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव मिस्त्री गुजरात में भाजपा के वरिष्ठ नेता व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक रहे पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला के साथ भाजपा से अलग हुए थे।
जानकारी के मुताबिक, मिस्त्री के भी संघ से करीबी रिश्ते रहे हैं। कांग्रेस नेतृत्व ने संभवत: कर्नाटक में कांग्रेस की सत्ता में वापसी कराने का इनाम उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाकर दिया है।
माना जा रहा है कि भाजपा के राष्ट्रीय स्तर पर ‘मिशन मोदी’ की राह को मुश्किल बनाने के उपाय तलाशने और प्रदेश प्रभारी के रूप में उत्तर प्रदेश लाए गए अमित शाह के दांव को कामयाब न होने देने के लिए कांग्रेस ने गुजरात के मधुसूदन मिस्त्री का दांव चला है।
शायद कांग्रेस के रणनीतिकारों का निष्कर्ष है कि भाजपा व संघ की नीति व रणनीति को करीब से जानने वाले मिस्त्री अपने मोदी व अमित शाह के दांवपेंच से भी पूरी तरह वाकिफ होंगे। इसलिए वह बेहतर तरीके से भाजपा के इन हथियारों का जवाब दे सकेंगे।
बात पुरानी पर समीकरण नए
वैसे यह पहला मौका नहीं है जब दो राष्ट्रीय दलों भाजपा व कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी एक राज्य से बनाए गए हों। इससे पहले भाजपा के प्रदेश प्रभारी नरेन्द्र तोमर मध्य प्रदेश के थे तो कांग्रेस के अभी तक प्रदेश प्रभारी रहे दिग्विजय सिंह भी मध्यप्रदेश के ही थे।
पर, इस बार समीकरण कुछ अलग है। कांग्रेस ने सिर्फ गुजरात के नेता को ही जिम्मेदारी नहीं दी है बल्कि एक ही वैचारिक स्कूल से निकले व्यक्ति को भाजपा का रथ आगे खींचने आए व्यक्ति की राह रोकने के लिए खड़ा किया है।
मिस्त्री व अमित शाह अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में कहां तक सफल होते हैं? कौन किस पर भारी पड़ता है और कौन किसे चुनावी अखाड़े में चित करता है?
इन सारे सवालों का जवाब तो भविष्य के गर्भ में छिपा है लेकिन कांग्रेस ने मिस्त्री को लाकर यूपी के चुनावी अखाड़े को दिलचस्प बनाने की कोशिश की है।