पाकिस्तान में हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले डॉ. ताहिरुल कादरी को बरेलवी मरकज बदमजहब करार दे चुका है। मरकज-ए-आला हजरत से पांच साल पहले उनके खिलाफ फतवा जारी हुआ था। यही नहीं, वह जब भारत आए थे तो यहां सुन्नियों ने इतना कड़ा विरोध किया कि उन्हें आनन-फानन में पाकिस्तान लौटना पड़ा।
इस्लामी संस्था मिनहाजुल कुरान लाहौर के अध्यक्ष डॉ. ताहिरुल कादरी की पाक हुकूमत के खिलाफ मोर्चेबंदी यूं कोई नई बात नहीं है, लेकिन सुन्नी बरेलवी आलिम की हैसियत से पहचाना जाना वाला यह शख्स हिंदुस्तान में विवादों के घेरे में तब आया, जब पांच साल पहले उन्होंने एक किताब ‘फिरकापरस्ती का खात्मा क्यों कर मुमकिन’ लिखी। इसमें उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि तमाम बदमजहबों में सिर्फ लफ्जों का फर्क है बाकी सब एक हैं। इमाम-ए-हरम के पीछे नमाज पढ़ने को भी जायज करार दिया।
जेहाद पर लिखी एक और किताब ‘वजाहत बिल कलम’ में उन्होंने आतंकी गतिविधियों को जायज बताया है। डॉ. कादरी का और भी ज्यादा विरोध तब शुरू हुआ जब उन्होंने लाहौर में एक मस्जिद बनवाकर उसमें दूसरे सभी मसलक और मजहब के लोगों को नमाज पढ़ने की इजाजत दे दी।
यहूदियों का एजेंट
इन्हीं मुद्दों पर पाकिस्तान के कुछ लोगों ने ताजुश्शरिया जानशीन मुफ्ती आजम हिंद अल्लामा अख्तर रजा खां उर्फ अजहरी मियां से सवाल पूछा था। इस पर अल्लामा अजहरी मियां ने डॉ. कादरी के खिलाफ फतवा दिया था। तीन पेज के इस फतवे में कहा गया है कि डॉ. कादरी की तमाम बातें अहले सुन्नत और आला हजरत मसलक के खिलाफ है। फतवे में उनकी किताबों को न पढ़ने, तकरीरों को न सुनने, उनकी बातों पर अमल न करने और उनसे कोई रिश्ता न रखने की हिदायतें दी गई थीं। यह तक कि डॉ. कादरी को बदअकीदा और यहूदियों का एजेंट तक करार दिया गया था।
दो महीने पहले डॉ. कादरी भारत आए थे। उनका हैदराबाद, मुंबई, बंगलूरू और अहमदाबाद में कार्यक्रम था। उनका रजा एकेडमी और आल इंडिया जमात रजा मुस्तफा के लोगों ने इस कदर विरोध किया कि उनका भारत में कोई भी कार्यक्रम नहीं हो सका था और उन्हें पाकिस्तान वापस लौटना पड़ा।
हुकूमत के खिलाफ मोर्चा ठीक नहीं
जमात रजा मुस्तफा के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना शहाबउद्दीन रजवी कहते हैं कि डॉ. कादरी का पाकिस्तानी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा जायज नहीं है। वैसे जम्हूरियत में सबको अपनी बात कहने का हक है। अपनी परेशानी रखने और विरोध दर्ज कराने का भी अधिकार है, लेकिन इसका तरीका लोकतांत्रिक होना चाहिए। मगर किसी भी हुकूमत को गिराने की बात करना अवाम के फैसलों को ही चैलेंज करना है। क्योंकि जम्हूरियत में देश की हुकूमत बनाने के लिए अवाम ही नुमाइंदे चुनती है। यूं डॉ. कादरी का तरीका अवाम के फैसले के भी खिलाफ है।