ललितपुर। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्र में बेटियों के प्रति लोगों की सोच बदली है। ऐसी ही स्थिति दस वर्षों बाद आए लिंगानुपात के आंकड़ों में देखने को मिली है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार दस वर्षों में कन्या लिंगानुपात में 19.8 प्रतिशत का इजाफा हुआ है।
जनपद में बीते वर्षों कन्याओं की जन्म दर कमजोर रही है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों में पिछले कई दशकों में कन्याओं का लिंगानुपात काफी कम रहा है। स्थिति यह रही कि यहां 800 का आंकड़ा भी पार नहीं कराया पाया। आठ सौ बेटियां और एक हजार बेटे पैदा होते रहे। इससे लगातार महिलाओं की संख्या पुुरुषों की अपेक्षा कम रही।
बालिकाओं की जन्म दर को बढ़ाने के लिए सरकार व कई सामाजिक संस्थाओं ने प्रयास किए और कार्यक्रम चलाकर लोगों को जागरूक किया लेकिन इसके खास नतीजा निकलकर सामने आए। बीते वर्षों में केंद्र व राज्य सरकार ने भी प्रयास किए, जिसमें बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे कार्यक्रम चलाए। वहीं बेटियों के विवाह में भी सरकार द्वारा मदद के रूप आर्थिक राशि दी गई। शायद यही कारण रहा कि दस वर्षों में कन्याओं के लिंगानुपात में वृद्धि हुई है।
वर्ष 2011 की जनगणना में जनपद का ललितपुर का लिंगानुपात 800 था। स्थिति यह रही कि प्रति हजार बेटों पर मात्र 800 बेटियां पैदा हो रही थीं। कन्याओं का प्रतिशत 80 प्रतिशत था। अब विभिन्न जागरूकता के चलते अब संख्या में वृद्धि हुई है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार अब लिंगानुपात 998 हो गया है। यानि एक हजार बेटों पर 998 बेटियां पैदा हो रहीं हैं। यहां पर दस वर्षों में कन्याओं के लिंगानुपात में 19.8 प्रतिशत की वृद्घि हुई है। अब कन्याओं का 99.8 प्रतिशत पहुंच गया है। जो प्रदेश में प्रथम स्थान पर चल रहा है।
इस बारे में अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अजय भाले ने बताया कि सरकार द्वारा भ्रूण हत्या को लेकर कड़े कानून लागू किए गए हैं। लिंग चयन प्रतिषेध अधिनियम भी कारगर साबित माना जा रहा है। साथ ही बताया कि समाजसेवी संस्थाओं द्वारा किया जा रहा जागरूकता का असर भी हो रहा है।