डोंगराखुर्द (ललितपुर)। प्रयाग पीठाधीश्वर गुरु शंकराचार्य स्वामी ओंकारानंद सरस्वती महाराज ने बुधवार को पर्यटन स्थलों का भ्रमण किया। अंजनी माता दरबार में उन्होंने माथा टेका और पूजा कर विश्वशांति की कामना की। उन्होंने कहा कि जनपद के धार्मिक स्थल पर्यटन के रूप में विकसित करना चाहिए। सरकार और यहां के जनप्रतिनिधि इस ओर ध्यान दें। भक्तों ने जगह-जगह उनका फूलमालाओं से स्वागत किया।
उन्होंने कहा कि मेरा यहां के मंदिरों से विशेष लगाव है। उन्होंने कहा कि ललितपुर सिद्ध क्षेत्र एवं शक्ति पीठों को पर्यटन के रूप में विकसित किया जाए। जनपद में ऐसे दर्जनों प्राचीन स्थल मौजूद हैं जिनमें पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। देवगढ़, नीलकंठेश्वर, अमझरा घाटी, पांडव वन, डुंगरासन माता, पांडव वन, कुंडेश्वर मंदिर, अंजनी माता एवं अन्य प्रमुख स्थलों को विकसित करने की पहल करनी चाहिए जिससे जनपद की पहचान देश में हो सके। मां अंजनी धर्मार्थ न्यास ट्रस्ट द्वारा शंकराचार्य की अगवानी की गई। वहीं चंद्रशेखर आजाद समिति द्वारा जगतगुरु का शॉल और श्रीफल भेंटकर सम्मान किया गया। मंदिर पर लगभग तीस मिनट तक रुकने के बाद शंकराचार्य ने प्रस्थान किया।
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अंजनी माता मेला में होगा भव्य कार्यक्रम
जगत गुरु शंकराचार्य द्वारा आने वाले चैत्र पूर्णिमा के अवसर पर मां अंजनी मेला में पधारने एवं अनुष्ठान करने की बात कही। मां अंजनी धर्मार्थ न्यास ट्रस्ट के प्रबंधक अध्यक्ष सहित सभी सदस्य, दयाशंकर चौधरी, संतोष कौशिक, नीरज चतुर्वेदी, संजय रावत, रामशरण दीक्षित, देवकी नंदन, रम्मी दीक्षित, ग्राम प्रधान प्रकाश निरंजन, महेंद्र विदुआ, संतोष निरंजन, शिवचरण निरंजन, श्रीराम निरंजन, प्रमोद सिरोठिया, अनुज दीक्षित, सौरव जैन, अनुज तिवारी, नारायण दास पलया, नत्थू निरंजन, मुकेश लिटोरिया, राजीव लिटोरिया, संदीप दुबे, रवि रजक सहित गांव के लोग उपस्थित रहे।
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भगवान भोलेनाथ और कामदेव की कथा सुनाई
डोंगराखुर्द/पाली। पंच दिवसीय शिव महिमा महोत्सव में प्रयाग पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य ओमकारानंद सरस्वती ने भगवान भोलेनाथ और कामदेव की कथा सुनाकर श्रद्धालुओं को भाव विभोर कर दिया।
उन्होंने कहा की माता सती के बाद भोलेनाथ घोर तपस्या में लीन हो गए तो सृष्टि का संचार ठप पड़ गया। उसी समय ब्रह्मा जी से वरदान पाकर तारकासुर नाम का राक्षस का उत्पात बढ़ने लगा। तारकासुर राक्षस ने ब्रह्मा जी से अमरता का वरदान मांगा था तो ब्रह्मा जी ने वरदान देते समय यह शर्त रखी थी कि तुम्हारी मौत सिर्फ शिव पुत्र से ही होगी। तारकासुर की मौत के लिए जरूरी था कि शिव और पार्वती का विवाह हो। देवताओं ने भगवान भोलेनाथ की समाधि भंग करने के लिए कामदेव को चुना। कामदेव ने सभी जतन कर डाले लेकिन भोलेनाथ की समाधि भंग नहीं कर सके।
इसके बाद कामदेव ने अपना प्रेम अस्त्र साधा और उस पर बाण चढ़ाकर भगवान के ऊपर छोड़ दिया। बाण लगते ही भगवान शिव का ध्यान भंग हो गया और क्रोधित होकर तीसरा नेत्र खोला तो उससे निकली ज्वाला में कामदेव पल भर में भस्म हो गए। कामदेव की पत्नी रति का रो-रोकर बुरा हाल था और उसके आंसुओं की धारा रुकने का नाम नहीं ले रही थी तब भगवान शिव ने कामदेव की पत्नी रति को सांत्वना देते हुए कहा की कामदेव का पुनर्जन्म द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र के रूप में जन्म होगा। इस मौके पर कई प्रमुख लोग मौजूद रहे।
अंजनी माता मंदिर में भक्तो को आशीर्वाद देते पीठाधीश्वर शंकराचार्य महाराज- फोटो : LALITPUR
अंजनी माता के दर्शन करते पीठाधीश्वर शंकराचार्य महाराज- फोटो : LALITPUR