फोटो..
बुंदेलखंड में हर साल जन्मजात ह्रदय रोग के साथ जन्म लेते 1650 बच्चे
- 412 को होती क्रिटिकल हार्ट डिजीज, करीब 200 तोड़ देते हैं दम
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। बुंदेलखंड में हर साल 1650 बच्चे जन्मजात ह्रदय रोग के साथ जन्म लेते हैं। 25 प्रतिशत यानी 412 को क्रिटिकल हार्ट डिजीज होती है। इनमें 50 फीसदी बच्चे तो इलाज के बाद ठीक हो जाते हैं मगर 200 को तमाम प्रयासों के बावजूद बचाया नहीं जा पाता।
ह्रदय में चार चैंबर होते हैं, जो सभी अलग-अलग होते हैं। जब बच्चा जन्मजात हार्ट डिजीज का शिकार होता है तो किसी में चैंबर कम बने होते हैं या मिले होते हैं। कभी-कभी धमनियां, शिराएं भी गलत जगह जुड़ जाती हैं। ऐसे बच्चे दूध पीते-पीते छोड़ देते हैं या पसीना आने लगता है। रोते-रोते भी शरीर में नीलापन आ जाता है। बार-बार इंफेक्शन की वजह से बच्चा बीमार पड़ जाता है। ज्यादा तेज सांस और धड़कन चलती है। बच्चे का शरीर अगर नीला पड़ने लगे तो स्थिति खतरनाक हो सकती है। ऐसे बच्चे को तुरंत ऑपरेशन की जरूरत पड़ती है। जिन बच्चों के शरीर में नीलापन नहीं आता है, उनको दवाओं से भी ठीक किया जा सकता है। महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में न्यू बॉर्न सिक केयर यूनिट बनी हुई है, यहां पर भर्ती करके बच्चों को दवाओं से ठीक किया जाता है। चूंकि, यहां पर कार्डियोथोरेसिक सर्जन नहीं है, ऐसे में गंभीर बच्चों को ह्रदय की सर्जरी के लिए रेफर करना पड़ता है।
आरबीएसके कार्ड बना तो नि:शुल्क सर्जरी
विशेषज्ञों ने बताया कि यदि बच्चे का आरबीएसके कार्ड बना हुआ है तो उसकी सर्जरी नि:शुल्क होती है। उत्तर प्रदेश लखनऊ और अलीगढ़ के मेडिकल कॉलेजों में हार्ट की सर्जरी की जाती है। झांसी से रेफर किए गए कई बच्चों की नि:शुल्क सर्जरी हो चुकी है।
बुंदेलखंड में इतने बच्चे हर साल लेते जन्म
जिला जन्म
बांदा 58800
झांसी 45000
जालौन 45300
ललितपुर 39223
चित्रकूट 30000
हमीरपुर 30845
महोबा 25600
बीमारी के ये हैं लक्षण
- बच्चे के शरीर में नीलापन आना
- दूध पीने में दिक्कत
- शारीरिक विकास रुक जाना
- सांस लेने में तकलीफ होना
- श्वांस दर बढ़ी हुई होना
- श्वांस नली में बार-बार संक्रमण
वर्जन..
हर एक हजार में छह बच्चे हार्ट डिजीज के साथ जन्म लेते हैं। चूंकि, बुंदेलखंड में हर साल 2.74 लाख बच्चों का जन्म होता है। ऐसे में बुंदेलखंड में 1650 बच्चे इस बीमारी का शिकार होते हैं। 25 फीसदी बेहद गंभीर होते हैं, जिनमें से आधों को बचा लिया जाता है। - डॉ. ओमशंकर चौरसिया, बाल रोग विभागाध्यक्ष, मेडिकल कॉलेज।