मड़ावरा (ललितपुर)। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं भगवान भरोसे हैं। हालात यह हैं कि चिकित्सकों समेत पैरामेडिकल स्टाफ की कमी से मड़ावरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रेफर सेंटर बन कर रह गया है। आलम यह है कि यहां महीनों से वाटर-कूलर और आरओ सिस्टम खराब पड़े हैं। इससे मरीजों को शुद्ध पेयजल तक नहीं मिल पा रहा है। वहीं तीमारदारों के रुकने के लिए बनाया गया रैन बसेरा मीटिंग हॉल और कबाड़ रखने का गोदाम बना गया है। अस्पताल के अधिकांश इन्वर्टर की बैटरियां बेकार हैं। स्थिति यहां तक हैं कि रात के समय बिजली चली जाने पर मोबाइल की टार्च की रोशनी में मरीजों का इलाज किया जाता है।
मड़ावरा में करीब 30 बेड की सीएचसी पर मात्र एक एमबीबीएस डॉक्टर तैनात है। जिन पर चिकित्साधीक्षक के साथ-साथ प्रशासनिक कार्यों का भी भार है। अस्पताल में एक डेंटल चिकित्सक भी है, लेकिन आवश्यक उपकरण एवं सामग्री उपलब्ध नहीं होने से ग्रामीणों को दंत चिकित्सा मुहैया नहीं हो पा रही है। हालात यह हैं कि केंद्र पर एक्सरे मशीन सुचारु है, लेकिन हड्डी रोग विशेषज्ञ नियुक्त नहीं होने से एक्सरे सुविधा का लाभ मरीजों को मिलता। नतीजतन अधिकांश मरीजों को जिला अस्पताल रेफर कर दिया जाता है।
अस्पताल में प्रतिदिन ओपीडी में एक चौथाई शिशु मरीज होते हैं, लेकिन बाल रोग विशेषज्ञ तैनात नहीं होने से छोटे बच्चों को उपचार नहीं मिल पाता है। नेत्र चिकित्सक, नाक, कान, गला रोग विशेषज्ञ समेत एक भी चिकित्सक नियुक्त नहीं है जिसके चलते मरीजों को स्थानीय स्तर पर सिर्फ बुखार, सर्दी-जुकाम, मलेरिया का उपचार ही मिल पा रहा है। अन्य इलाज हेतु अधिकांश मरीजों को उपचार हेतु बाहर जाना पड़ता है।
स्त्री रोग विशेषज्ञ भी नहीं
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर उपचार के लिए आने वाले कुल मरीजों में पचास फीसदी संख्या महिला मरीजों की होती है, लेकिन अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ अथवा महिला चिकित्सक नहीं होने से महिला संबधी रोगों का उपचार नहीं मिल पा रहा है। वहीं गर्भावस्था के दौरान उचित चिकित्सकीय परामर्श नहीं मिलने से प्रसव उपरांत नवजात शिशुओं में कुपोषण की शिकायत बढ़ती दिख रही है।
लैब टेकभनीशियन भी तैनात नहीं
पैथालॉजी में लैब टेक्नीशियन तैनात नहीं है। आधा-अधूरा काम लैब असिस्टेंट के भरोसे चल रहा है, जिसके चलते मलेरिया की जांच भी दो-दो दिन बाद मिल पा रही है। अस्पताल में मलेरिया के अलावा टाइफायड, सीबीसी, ब्लड ग्रुप जैसी सामान्य जांच सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। गर्भवती महिलाओं के संस्थागत प्रसव और प्रसव उपरांत जच्चा -बच्चा को भर्ती रखने के लिए मेटरनिटी विंग में भी सुविधाओं का टोटा है।
एसएनसी यूनिट बंद पड़ी
कमजोर नवजात शिशुओं की विशेष देखभाल के लिए संचालित एसएनसी यूनिट बंद पड़ी है। ऐसे में नवजात शिशुओं को जिला अस्पताल रेफर कर दिया जाता है। कुपोषित बच्चों एवं उनकी माताओं को भर्ती करने के लिए संचालित बाल पोषण पुनर्वास केंद्र में भी दो-तीन बच्चे भर्ती है,ं लेकिन छुट्टी के बाद उनका कोई फीडबैक नहीं लिया जाता है। सीएचसी पर ब्लॉक एकाउंट मैनेजर की तैनाती नहीं होने से जननी सुरक्षा योजना, महिला नसबंदी समेत विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों के प्रोत्साहन राशि के भुगतान में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
बदहाल हैं उपकेंद्र, कहीं एएनएम नहीं तो कही भवन जर्जर
32 स्वास्थ्य उपकेंद्रों में से ग्राम पटना, जलंधर, इकौना, पीडार समेत नौ उपकेंद्र एएनएम के अभाव में खाली हैं। वहीं बहादुरपुर, इकौना, सीरोन जैसे तमाम उपकेंद्र सरकारी बिल्डिंग में संचालित नहीं होने से भवन जर्जर होते जा रहे हैं। मड़ावरा क्षेत्र के मदनपुर, गिरार, डोंगराखुर्द स्थित नवीन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में कोई डॉक्टर तैनात नहीं है। जिसके चलते ग्रामीणों को स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं।
अस्पताल में स्वास्थ्य सुविधाओं को और अधिक बेहतर बनाए जाने और डॉक्टरों की तैनाती के लिए उच्चाधिकारियों से पत्राचार किया गया है। अन्य जो भी कमियां है उन्हें शीघ्र ही दूर किया जाएगा।- डॉ. अशोक कुमार, चिकित्सा अधीक्षक, मड़ावरा