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पहले जातपात पर नहीं पार्टी की नीतियों पर होता था चुनाव

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ललितपुर। पिता से विरासत में मिली राजनीत में आए राजेश खैरा ने कांग्रेस से टिकट लेकर वर्ष 1985 में सदर विधान सभा क्षेत्र का चुनाव लड़ा और जीतकर सदन में पहुंचे लेकिन राजनीत में आए बदलाव के चलते वह आज सक्रिय राजनीत से हासिए पर आ गए। उनका कहना है कि पहले जातपात पर नहीं पार्टी की नीतियों पर चुनाव होता था लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं, अब पूंजीपति ही चुनाव लड़ सकते हैं। क्योंकि, चुनाव प्रचार में गाड़ियों के अलावा कार्यकर्ताओं पर भी पैसा खर्च करना पड़ता है।
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वर्ष 1952 और 1957 में कांग्रेस से विधायक रहे रमानाथ खैरा से विरासत में मिली राजनीत में आकर उनके पुत्र राजेश खैरा ने 1974 में कांग्रेस से अपना राजनीतिक कैरियर शुरू किया। वह 1978 में एनएसयूआई के जिलाध्यक्ष बने, 1982 में युवक कांग्रेस के मंडल महामंत्री बनकर बुंदेलखंड में कांग्रेस को मजबूत करने में जुट गए। वर्ष 1985 में कांग्रेस ने सदर विधानसभा क्षेत्र से उन्हें चुनाव में उतारा तो जनता ने उन्हें जिताकर सदन में भेज दिया। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या ने उन्हें झकझोर दिया। वह राजनीत से हटकर परिवार को समय देने के लिए पूना चले गए, लेकिन पार्टी नेताओं ने उन्हें वर्ष 2007 में फिर सदर विधान सभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतार दिया। नतीजतन उन्हें बसपा प्रत्याशी इंजीनियर नाथूराम से हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने अपने दो बेटों की परवरिश में समय देना शुरू किया, आज दोनों बेटे डॉक्टर बन गए। उन्होंने बताया कि जब वह चुनाव लड़े थे तब इस क्षेत्र में गहोई वैश्य समाज के मात्र 500 वोट थे, लेकिन उन्हें सर्व समाज ने जिताकर भेज दिया। आज ऐसा नहीं है राजनीतिक दल जातीय आधार पर प्रत्याशी चुनाव में उतारते हैं और वे पैसा खर्च कर चुनाव लड़ते हैं।
बेटे राजनीति में आने को नहीं हुए तैयार
पूर्व विधायक राजेश खैरा ने कहा कि राजनीति में आए बदलाव के चलते उनके दो बेटों में से कोई भी राजनीति में आने को तैयार नहीं हुआ। इनमें एक बेटा डॉ आकाश खैर शहर में आर्थोपेडिक सर्जन हैं और दूसरा बेटा डॉ.गगन खैरा इस समय जर्मनी में है।
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पहला चुनाव छह लाख में लड़ा गया और अब करोड़ों खर्च होते
पूर्व विधायक ने बताया कि उन्होंने 1985 में पहला चुनाव छह लाख रुपये खर्च करके लड़ा था, लेकिन आज करोड़ों रुपये चुनाव लड़ने के लिए चाहिए। प्रचार में भी संबंधों को लोग निभाकर खुद जुट जाते थे लेकिन आज ऐसा नहीं है। आज चुनाव लड़ने वालों में कटुता हो रही है, जो कि भविष्य की राजनीति के लिए अच्छा नहीं है।
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