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डुंगरासन माता की कृपा से बनते हैं भक्तों के बिगड़े काम

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माता रानी का दरवार - फोटो : LALITPUR
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ललितपुर/डोंगराखुर्द। नाराहट क्षेत्र जामनी बांध सड़क पर डोंगराखुर्द में एक पहाड़ी पर स्थित डुंगरासन माता मंदिर शक्ति पीठ पर नवरात्र में दूरदराज से भक्तों का तांता लगा रहता है। मान्यता है कि नवरात्र में माता रानी सिद्धियों से परिपूर्ण हो करके भक्तों का कल्याण करती हैं। प्राचीन काल से ही यहां अद्भुत चमत्कार होते आए हैं। पंचमी को माता डुंगरासन का विशेष पूजन अर्चन अभिषेक एवं सहस्त्रार्चन किया जाता है। जिसमें प्रदेश के अलावा मध्य प्रदेश से काफी श्रद्धालु आकर भाग लेते हैं।
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ये है मंदिर का इतिहास
डुंगरासन माता महामाया विंध्यवासिनी है, जो विंध्याचल में हैं। इस प्राचीन स्थल के संबंध में बताया जाता है कि मथुरा के राजा कंस के हाथ से छूटकर कर जो कन्या भविष्यवाणी करती हुई आकाश की ओर चली गई थी वहीं कन्या विध्यांचल विंध्यवासिनी देवी के नाम से विख्यात है। जो प्राचीन यंत्र विंध्यवासिनी में स्थापित है, वहीं, यंत्र डुंगरासन माता मंदिर पर स्थापित पत्थर पर अंकित है। यही यंत्र नौ देवी के रूप में पूजते हैं। विद्वानों के मुताबिक पूर्व में ऋषि मुनियों यहां आकर तपस्या की है, यहां आने वाले भक्तों की मुराद पूरी होती है। नवरात्र में दूरदराज से श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है लेकिन रात में मंदिर प्रांगण के आसपास वह लोग ठहर नहीं पाते हैं इसलिए रात में पूजा अर्चना कर मंदिर पर कोई रूकता नहीं है। पहाड़ी के नीचे उत्तर दिशा में प्राचीन श्रीशंख नाथ मंदिर एवं पूर्व में शिवलिंग स्थापित है जो पुरातत्व विभाग में अंकित है।
एक हजार फिट ऊंचे मंदिर में दर्शन करने के लिए 200 सीढ़ियां चढ़नी होती
विंध्याचल पर्वत की एक निराली पहाड़ी है जिसकी ऊंचाई एक हजार फीट है और 200 सीढ़ियों की चढ़ाई कर जाना पड़ता है तब माता डुंगरासन के दर्शन होते हैं। बरसात के दिनों में विंन्ध्याचल पर्वतों की हरी भरी छटा पहाड़ी के चारों ओर छोटे-छोटे खेत दिखाई पड़ते हैं। सैलानियों को यह दृश्य मन मोहित करता है।
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डुंगरासन माता मंदिर में नवरात्र में विशेष पूजन अर्चन होता है। इस बार भी कोविड नियमों का पालन करते हुए श्रद्धालु मातारानी के दर्शन कर सकेंगे। प्राचीन काल में ऋषि मुनियों ने यहां आकर तपस्या की ओज भी कई विद्वान माता रानी की आराधना के लिए यहां आते हैं। मुगलकालीन शासन में इस मंदिर को कई बार क्षतिग्रस्त करने की कोशिश की गई लेकिन मुगलों को सफलता नहीं मिली।- पं . महेंद्र त्रिपाठी, आचार्य
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