मेला मैदान रामलीला के दौरान धनुष तोड़ते श्रीराम चंद्र। संवाद
लखीमपुर खीरी। जनकपुरी में एक से बढ़कर एक राजा अपनी शक्ति के दम पर शिवधनुष उठाने पहुंचे, लेकिन कोई उसे हिला तक नहीं सका। इसके बाद गुरु विश्वामित्र की आज्ञा पाकर श्रीराम ने भगवान शिव का स्मरण किया और सहजता से धनुष उठाकर तोड़ दिया।
धनुष भंग होते ही जय श्रीराम के जयकारों से जनकपुरी गूंज उठी। सीता ने श्रीराम के गले में वरमाला डाल दी। 162वीं ऐतिहासिक रामलीला में बुधवार को धनुष यज्ञ के मंचन ने यही संदेश दिया कि अहंकार और शक्ति प्रदर्शन से बड़ी आस्था, विनम्रता और गुरु की आज्ञा होती है।
रामचरितमानस के प्रसंग के अनुसार, जनक की प्रतिज्ञा सुनकर अनेक राजा शिवधनुष उठाने का प्रयास करते हैं, लेकिन सभी असफल रहते हैं। तब गुरु विश्वामित्र श्रीराम को धनुष उठाने की आज्ञा देते हैं। श्रीराम मन ही मन गुरु को प्रणाम करते हैं और भगवान शिव का स्मरण कर धनुष उठा लेते हैं। उनके धनुष तोड़ते ही पूरा परिसर जयकारों से गूंज उठता है। इसके बाद सीता श्रीराम को वरमाला पहनाती हैं।
इस प्रसंग का मंचन मेला मैदान में किया गया। रामलीला में बच्चों ने श्रीराम, सीता सहित विभिन्न पात्रों की भूमिका निभाई। इससे पहले रामलीला के पात्रों की शोभायात्रा मथुरा भवन से निकाली गई। सेठ गया प्रसाद ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने पूजन किया। इसके बाद शोभायात्रा शहर के प्रमुख मार्गों से होते हुए मेला मैदान पहुंची।