तंत्र और वास्तुशिल्प का अनूठा संगम, मेंढक की पीठ पर शिवमंदिर
‘मंडूक तंत्र’ और ‘श्रीयंत्र’ के आधार पर निर्मित देश का अकेला मंदिर, आज महाशिवरात्रि पर लगेगा आस्था का मेला
लखीमपुर खीरी। तंत्र साधना जितनी रहस्यमयी व अनोखी होती है, ओयल का शिव मंदिर भी अपने आप में उतना ही अनूठा है। खास यह कि मंदिर पत्थर के विशाल मेंढक की पीठ पर बना है। मंदिर का आधार भाग अष्टदल कमल के आकार का है। इसी कारण यह मंडूक तंत्र और श्रीयंत्र पर आधारित कहा जाता है। 19वीं सदी के आरंभ में यहां के शासक व चाहमान वंश के तत्कालीन राजा बख्त सिंह ने बाढ़-अकाल जैसी आपदाओं से बचाव की कामना से इस मंदिर का निर्माण कराया था। दीपावली और महाशिवरात्रि पर यहां पूजन के लिए बड़ी संख्या में लोग आते हैं। परंपरानुसार यहां पहला पूजन कैमहरा रियासत के उत्तराधिकारी ही करते हैं।
लखीमपुर शहर से करीब 12 किलोमीटर दूर स्थित ओयल कस्बा प्राचीन काल में नैमिषारण्य का हिस्सा हुआ करता था। यह शैव संप्रदाय और शिव उपासना का प्रमुख केंद्र था। तब यह कस्बा अपनी कला, संस्कृति और समृद्धि के लिए भी प्रसिद्घ था। रियासत काल में ओयल के शासक भगवान शिव के उपासक थे। मंदिर की वास्तु परिकल्पना कपिला के एक महान तांत्रिक ने की थी। तंत्र पर आधारित यह मंदिर अपनी विशेष वास्तु शैली के कारण ही प्रसिद्ध है।
38 मीटर लंबा है मेंढक
मंदिर पत्थर के जिस मेंढक पर बना है, उसकी लंबाई 38 मीटर और चौड़ाई 25 मीटर है। मेंढक का मुंह तथा अगले दो पैर उत्तर की दिशा में हैं। इसका मुंह दो मीटर लंबा, डेढ़ मीटर चौड़ा तथा एक मीटर ऊंचा है। इसके पीछे का भाग दो मीटर लंबा तथा 1.5 मीटर चौड़ा है। पिछले पैर दक्षिण दिशा में दिखाई देते हैं। उभरी गोलाकार आंखें तथा मुख का भाग जीवंत प्रतीत होता है। मेंढक के शरीर का आगे का भाग उठा हुआ तथा पीछे का दबा हुआ है जो किसी मेंढक के बैठने की स्वाभविक मुद्रा है।
काले-स्लेटी पत्थर का शिवलिंग
मंदिर के पुजारी शांति स्वरूप तिवारी ने बताया कि तांत्रिक संरचनाओं में अष्टदल कमल का बड़ा महत्व है। इस मंदिर का आधार भाग अष्टदल कमल जैसा बनाया गया है। यह आधार श्रीयंत्र का निर्माण करता है। मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व की ओर तथा दूसरा द्वार दक्षिण की ओर है। मंदिर में काले-स्लेटी पाषाण का दिव्य शिवलिंग है। यह सफेद संगमरमर की एक मीटर्र ऊंचे तथा 0.7 मीटर व्यास की दीर्घा में बने गर्भगृह के मध्य स्थित है। शिवलिंग को भी कमल के फूल पर अवस्थित किया गया है।
यहां नंदी की प्रतिमा है खड़ी मुद्रा में
मंदिर में उत्तर-पूर्व कोने पर भगवान शिव की ओर मुंह किए सफेद संगमरमर की भव्य नंदी प्रतिमा स्थापित की गई है। यह संभवत: तंत्र साधना के लिए महत्वपूर्ण है। आम तौर से शिव मंदिरों में नंदी की मूर्ति बैठी अवस्था में मिलती है। यहां नंदी की प्रतिमा खड़ी अवस्था में है, जैसे कहीं जाने के लिए तत्पर हो। बस, भगवान के आदेश की प्रतीक्षा है। मंदिर के अंदर से सुरंग है, जो बाहर परिसर में पश्चिम की ओर खुलता है। माना जाता है कि इससे राजपरिवार के लोग पूजा करने आते रहे होंगे।
चार कोनों पर मंदिर, पर देवमूर्ति नहीं
विशाल परिसर में जिसके मध्य यह मंदिर निर्मित है, लगभग 100 मीटर का वर्गाकार है। मंदिर का निर्माण पांच मीटर ऊंचे वर्गाकार जगती पर किया गया है। ऊपर जाने के लिए चारों तरफ सीढ़ियां बनी हैं। मंदिर का गर्भगृह चतुष्कोणीय है। इसका निर्माण ईंटों और चूने के गारे से हुआ है। बाहरी दीवारों पर देवी-देवताओं, संतों और योगियों की विभिन्न मुद्राओं में मूर्तियां हैं। शिखर गुम्बदाकार है। मंदिर के चारो कोनों पर चार अष्टकोणीय छोटे मंदिर बने हैं। इनमें देव मूर्ति स्थापित नहीं है। मंदिर का भीतरी भाग दांतेदार मेहराबों, पद्म पंखुड़ियों, पुष्पपत्र अलंकरणों से चित्रांकित है। इनके विशालकाय ताखों में तांत्रिक क्रियारत मूर्तियां हैं। मंदिर की जगती पर पूर्व की ओर लगभग 2 फुट व्यास का कुआं है। इसका जलस्तर भूतल के समानांतर प्रतीत होता है।
आज सुबह चार बजे पहली पूजा
पुजारी शांति स्वरूप तिवारी ने बताया कि श्रद्घालुओं की भीड़ के मद्दनजर महाशिवरात्रि की सारी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। कपाट ब्रह्ममुर्हूत में प्रात: 4:00 बजे खुलेगा। सबसे पहले राजपरिवार के लोग पूजन करेंगे। फिर सुबह करीब पांच बजे से आम श्रद्धालु भोलेनाथ के दर्शन कर सकेंगे। सुबह से मंदिर में प्रसाद वितरण चलेगा। शाम से रात 12बजे तक नाट्य कलाकार सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मंचन करेंगे। इसमें शिवविवाह विशेष होगा। किसी तरह की अव्यवस्था न हो इसके लिए पुलिस भी यहां मौजूद रहेगी। परिसर में कई सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए हैं।