लखीमपुर खीरी। जिले की राजनीति में रियासतों की सियासत ने भी अपना दबदबा कायम किया है। आजादी के बाद राजघरानों का राजपाट गया तो उन्होंने लोकतंत्र की सीढ़ियों से सत्ता तक अपनी पहुंच बनाई। जिले के पांच प्रमुख राजघरानों ने जिले की राजनीति में अपना दबदबा कायम किया। जिले की प्रतिष्ठित ओयल स्टेट से राजपरिवार से राजा युवराजदत्त सिंह शाहाबाद क्षेत्र से सांसद तो उनके बेटे जगदीश नरायन दत्त सिंह मोहम्मदी से विधायक रहे। ईसानगर, झंडी और महेवा स्टेट राजपरिवार के लोगों ने कई बार विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया।
आजादी के बाद से ही राजनीति में जिले के राजघरानों का दखल शुरू हो गया था, लेकिन वर्ष 1962 के चुनाव से राजघरानों ने चुनावी राजनीति में भी अपने कदम जमाने शुरू कर दिए। राजनीति में कदम रखा तो अपने महलों में दरबार लगाने वाले राजघरानों को जनता के दरबार में हाजिरी लगानी पड़ी। हालांकि कोटवारा स्टेट आजादी से पहले भी सक्रिय राजनीति में आ गई थी।
कोटवारा के राजा सैयद साजिद हुसैन आजादी से पहले ही 1936 से 52 तक संयुक्त प्रांत असेंबली के सदस्य रहे। वह कुछ समय के लिए असेंबली के स्पीकर भी रहे। वह तालुकेदार कोटे से सदस्य बने थे, लेकिन आजादी के बाद वह सक्रिय राजनीति से अलग हट गए। सैयद साजिद हुसैन कोटवारा स्टेट के मौजूदा उत्तराधिकारी जाने माने फिल्म निर्माता, निर्देशक मुजफ्फर अली के पिता थे।
आजादी के बाद ओयल राजघराने ने राजनीति में रखा कदम
आजादी के बाद वर्ष 1952 के चुनाव में जिले के राजघरानों का अप्रत्यक्ष रूप से दखल जरूर रहा, लेकिन चुनाव मैदान में नहीं उतरे। 1957 के विधानसभा चुनाव में ओयल स्टेट के जगदीश नरायन दत्त सिंह मोहम्मदी विधानसभा क्षेत्र से जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़कर विधायक बने। 1962 के चुनाव में ओयल स्टेट के राजा युवराजदत्त सिंह शाहाबाद संसदीय सीट से लोकसभा का चुनाव जीत कर जनसंघ से सांसद बने। इसके बाद इस राजपरिवार से कोई सदस्य चुनाव मैदान में नहीं उतरा। आज भी इस परिवार के लोग सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए हुए हैं।
झंडी राजघराने के राजबृजराज सिंह रहे दो बार विधायक
निघासन क्षेत्र की झंडी स्टेट के राजा राजबृजराज सिंह श्रीनगर विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक रहे। वर्ष 1974 में वह पहली बार श्रीनगर विधानसभा क्षेत्र से जनसंघ के टिकट पर चुनाव जीतकर विधायक बने। 1977 में भी वह जनसंघ से विधायक रहे, लेकिन 1980 के चुनाव में वह कांग्रेस उम्मीदवार महेवा स्टेट के कुं. उपेंद्र बहादुर बहादुर सिंह से पराजित हो गए। इसके बाद इसी राजघराने के धीरेंद्र बहादुर सिंह एक बार विधायक और एक बार विधान परिषद सदस्य रहे। धीरेंद्र बहादुर सिंह को इस क्षेत्र से चार बार हार का सामना करना पड़ा।
धौरहरा पर रहा ईसानगर राजपरिवार का दबदबा
धौरहरा क्षेत्र में ईसानगर राजघराने का दबदबा रहा है। ईसानगर राजपरिवार के सरस्वती प्रताप सिंह 1974 में पहली बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीत कर विधायक बने। इसके बाद 1985 में वह फिर निर्दलीय विधायक बने। 1989 के चुनाव उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की। 1996 में वह लोकतांत्रिक कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत कर विधायक बने और उन्हें प्रदेश मंत्रिमंडल में भी जगह मिली। उनके बाद उनकी पत्नी आरती सिंह और पुत्र समर प्रताप सिंह भी चुनाव लड़े लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल सकी।
महज 225 वोटों से हार गए थे कोटावारा के मुजफ्फर अली
कोटवारा स्टेट के उत्तराधिकारी प्रसिद्ध फिल्म निर्माता, निर्देशक मुजफ्फर अली वर्ष 1993 में लखीमपुर विधानसभा क्षेत्र से सपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे। इस चुनाव में वह भाजपा उम्मीदवार राम गोपाल वर्मा से महज 225 वोटों से पराजित हो गए थे। लखनऊ से भी चुनाव लड़े, लेकिन उन्हें वहां भी हार का सामना करना पड़ा। मुजफ्फर अली ने फिलहाल सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली है।