लखीमपुर खीरी। कभी फिल्मों के शौकीनों से गुलजार रहने वाला लखीमपुर अब सिनेमा के सन्नाटे का गवाह बन गया है। एक दौर था, जब जिले में 11 सिनेमा हॉल संचालित थे और नई फिल्म लगते ही टिकट खिड़कियों पर लंबी कतारें लग जाती थीं। इन सिनेमा घरों से करोड़ों की कमाई होती थी।
एक घंटा पहले लाइन लगाना आम बात थी। टिकट ब्लैक में बिकते थे और कई फिल्में महीनों तक दर्शकों को खींचती थीं। शहर की सड़कों पर पोस्टरों की भरमार रहती थी और सिनेमा लोगों के मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन हुआ करता था, लेकिन वक्त बदला और सिनेमा व्यवसाय घाटे में चला गया। धीरे-धीरे एक के बाद एक सिनेमा हॉल बंद होते चले गए। पुराने लोगों का कहना है कि परिवार के साथ सिनेमा देखने जाते थे तो ये किसी पिकनिक से कम नहीं लगता था।
आज स्थिति यह है कि जिले के 11 में से 10 सिनेमा हॉल या तो बंद हो चुके हैं या अपनी पहचान खो चुके हैं। कहीं शॉपिंग मॉल बन गए हैं, कहीं मैरिज लॉन, तो कहीं होटल, बार, रेस्टोरेंट और जिम। गोला का एक सिनेमा हॉल मैरिज लॉन में तब्दील हो चुका है, जबकि शहर के कई सिनेमाघर अब व्यापारिक परिसरों के रूप में नजर आते हैं।
वर्तमान में जिले में केवल एक सिनेमा हॉल ‘आनंद’ ही चल रहा है, लेकिन वहां भी दर्शकों की संख्या बेहद कम है। कभी तालियों और सीटियों से गूंजने वाले हॉल अब खामोशी में डूब गए हैं। लखीमपुर में सिनेमा का सुनहरा दौर अब सिर्फ यादों में सिमट कर रह गया है।
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उस दौर में सिनेमा देखना सिर्फ फिल्म देखना नहीं, बल्कि एक त्योहार जैसा होता था। परिवार के साथ सिनेमा जाना एक यादगार पल होता था। आज मोबाइल फोन और ओटीटी ने उस सामूहिक आनंद को खत्म कर दिया है। - प्रतिमा भसीन
सिनेमाघरों की रौनक, दर्शकों की तालियां और सीटियां अब सिर्फ याद बनकर रह गई हैं। तकनीक के इस दौर में छोटे शहरों में सिनेमा दम तोड़ गए। आज जब ये बंद पड़े हैं तो लगता है कि जैसे शहर की सांस्कृतिक धरोहर ही खो गई। -सलीम खान
सिनेमाघरों से शहर की पहचान जुड़ी थी। उनके बंद होने से न सिर्फ मनोरंजन, बल्कि आसपास की रौनक और व्यापार भी प्रभावित हुआ है। भीड़ को संभालने के लिए पुलिस लगानी पड़ती थी।
- राजू शुक्ला, सिनेमा संचालक
स्कूल से सीधे सिनेमा हॉल पहुंच जाते थे, टिकट लेने के लिए जुगाड़ लगाना पड़ता था, बड़े हुए मो बच्चाें को लेकर जाते थे। वह दौर सिर्फ यादों में रह गया।
- चंद्रिका प्रसाद
35 वर्ष हो गए सिनेमा हॉल की नौकरी करते हो गया है, सिनेमा के कई दौर देखे। यहां तो 24 घंटे भीड़ और रौनक रहती थी। व्यापार खत्म हो गया अब तो सन्नाटा पसरा रहता है।
- पप्पू भार्गव
पप्पू भार्गव
पप्पू भार्गव
पप्पू भार्गव
पप्पू भार्गव
पप्पू भार्गव