धनगढ़ी (नेपाल)। नेपाल के सुदूर पश्चिम प्रदेश सहित तराई और पहाड़ी क्षेत्रों में होली पर्व को लेकर उत्साह चरम पर है। यहां की भौगोलिक विविधता की तरह ही होली मनाने के तौर-तरीके भी अलग और बेहद पारंपरिक हैं।
पहाड़ी जिलों में पूर्णिमा के दिन ही रंगों की होली खेली जाती है, जबकि तराई के जिलों में इसके अगले दिन ‘होली हुड़दंग’ पर रंगोत्सव मनाया जाता है। नेपाल में भारतीय परंपरा के विपरीत कई स्थानों पर होलिका दहन का प्रचलन नहीं है। यहां आपसी सद्भाव, लोक संस्कृति और सामूहिक उत्सव ही मुख्य आकर्षण होते हैं।
पहाड़ी इलाकों में लोग एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर बधाई देते हैं और देउड़ा नृत्य की थाप पर थिरकते हैं। विशेष रूप से अछाम जिला की परंपरा सबसे अलग मानी जाती है। यहां आज भी बिना रंगों के केवल देउड़ा गीत गाकर होली खेलने का वर्षों पुराना रिवाज कायम है। टीकापुर में बसे अछामी समुदाय के लोग भी इस परंपरा को जीवंत रखे हुए हैं।
तराई के कैलाली जिला, कंचनपुर जिला, दांग जिला, बांके जिला और बर्दिया जिला में रहने वाले थारू समुदाय की होली सबसे अलग और लंबी चलने वाली होती है। थारू गांवों में होली का उल्लास करीब सवा महीने तक रहता है। पर्व से लगभग 15 दिन पहले ‘जिंदा होली’ की शुरुआत हो जाती है, जिसमें सामूहिक नृत्य-गान और पारंपरिक गीतों की गूंज सुनाई देती है। मुख्य दिन के बाद अगले आठ दिनों तक ‘मरी होली’ खेली जाती है और इसका समापन ‘खकरेड़ा’ उत्सव के साथ होता है।
इन दिनों थारू गांवों में होली की रौनक देखते ही बन रही है। युवक-युवतियों की टोलियां गांव-गांव जाकर होली, सखिया, झुमरा और भुवा नृत्य प्रस्तुत कर रही हैं। जैसे-जैसे होली नजदीक आ रही है, सीमावर्ती बाजारों में भी खरीदारी के लिए भीड़ उमड़ रही है। रंग, पिचकारियां और पारंपरिक परिधान से बाजार पटे पड़े हैं और हर ओर फागुन की मस्ती छाई हुई है।