भारत-नेपाल सीमा पर जंगलों के बीच बसे थारू समाज के हस्तशिल्प की है दूर तक पहचान
पलियाकलां/चंदनचौकी। तराई क्षेत्र की नेपाल सीमा से सटे गांवों में रहने वाली थारू जनजाति की अनूठी संस्कृति ही उसकी पहचान है। इनकी संस्कृति की अगर बात करें तो अलग परंपराएं, भोजन, वेशभूषा, धार्मिक आयोजन और सामाजिक संस्कार इसे अनूठा बनाते हैं। इनका मनमोहक लोकनृत्य विशेष रूप से प्रसिद्घ है। पहले केवल कृषि पर निर्भर रहने वाली इस जनजाति के लोग अब समाज की मुख्यधारा से जुड़कर आत्मनिर्भर बन रहे हैं। सदियों से जंगल के बीच रहने के कारण यह लोग अब वन्यजीवन में पूरी तरह रम गए हैं।
थारू समाज के लोग अपने आप को महाराणा प्रताप का वंशज मानते हैं। बताते हैं कि राजस्थान के थार के निवासी हैं। मुगलों के आक्रमण के दौरान वहां से राजपूत महिलाएं सुरक्षा की दृष्टि से सेवकों के साथ राजस्थान से निकलकर हिमालय की तलहटी के जंगलों में आकर बस गईं। लंबे इंतजार के बाद भी जब उनके परिवार के पुरुष वापस नहीं आ सके तो उन्होंने अपने सेवकों के साथ संबंध बनाकर अपने वंश को आगे बढ़ाया। इस तरह उनकी जो नस्ल तैयार हुई उसे थारू जनजाति का नाम मिला। इस जनजाति को नेपाल में मुख्य जनजाति का दर्जा दिया गया है। थारू जनजाति में चौधरी, कुसमी, महतो, दनुवार, राणा, कुमाल, कठरिया समेत अन्य उपजातियां आती हैं। (संवाद)
आधुनिकता के दौर में अब त्योहारों पर ही नजर आती है थारू संस्कृति
थारू समाज की अपनी अलग संस्कृति है। इनका रहन-सहन, भाषा, बोली से लेकर पहनावा तक सब अलग है। थारू पुरुष ऊंची धोती और फतुही पहनते हैं तो महिलाएं घाघरा, अंगिया और उनिया पहनती थीं। घाघरा-चोली में शीशें जड़े रहते हैं। महिलाएं कपड़ों में खुद कसीदाकारी कर उसे खूबसूरत बनाती हैं, लेकिन धीरे-धीरे इनका पहनावे में बदलाव आया। आधुनिकता की बयार में थारू समाज भी अब आधुनिक बन गया है। हालांकि त्योहारों समेत कई महोत्सवों में अब भी थारू समाज की पुरानी संस्कृति की झलक देखने को मिल जाती है।
थारू समाज में दाल, भात, घोंगी, मछली, सुअर का मांस बहुत पसंद किया जाता है। अगर बात की जाए तो यहां के लोग मछली-चावल बड़े चाव से खाते हैं। साथ ही जौ और जड़ी बूटियों से बनी शराब का सेवन भी करते हैं। इस शराब को जाड़ कहते हैं।
मकर संक्रांति से होती है थारू समाज के नए साल की शुरूआत
थारू हिंदू धर्म को मानते हैं। यहां मकर संक्रांति के पर्व को माघी पर्व के रूप में मनाते हैं, जो थारू समाज में सबसे बड़ा पर्व होता है। इस दिन से ही थारू समाज के नए वर्ष की शुरूआत होती है और सभी नए और शुभ कार्य शुरू होते हैं। बाकी कृष्ण जन्माष्टमी, नवरात्र, तिजिया के साथ ही बड़े रविवार को चरई का त्योहार मनाया जाता है। यह चैत्र माह में मनाया जाता है। इस दिन घर में मछली, शराब, मीठा चावल और दही आदि बनता है।
कृष्ण जन्माष्टमी के 16 दिन बाद पड़ने वाले रविवार को धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन यह लोग घर में स्थापित देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। सकहरी भोजन या प्रसाद बनाते हैं। होली भी इनका खास त्योहार है। थारू जनजाति के लोग होली कई दिन तक मनाते हैं। इस दौरान शाम को थारू महिला-पुरुष अपने परंपरागत परिधान में जमकर नृत्य करते हैं।
बहुत मजबूत है थारुओं का सामाजिक ढांचा
थारू समाज की सामाजिक प्रक्रिया बेहद मजबूत है। थारू समाज मातृ सत्तात्मक समाज है। घर में महिलाओं का निर्णय ही सर्वोपरि रहता है। समाज के लोग लड़ाई, झगड़ा या किसी प्रकार के विवाद को गांव में ही पंचायत के माध्यम से निपटा लेते हैं। पंचायत के प्रधान को पधना कहते हैं। उसका निर्णय सभी को मान्य होता है। गांव में एक भलमनसा भी होता है, जो एक तरह से विपक्ष की भूमिका निभाता है। इसके अलावा हर गांव में एक भर्रा होता है, जो इंसानों से लेकर पशुओं तक का इलाज जड़ी-बूटियों के जरिए करता है। यही नहीं वह झाड़-फूंक का काम भी करता है। यहां अनाज उत्पादन हो या फिर जानवर का शिकार हो, सबसे पहले अपने कुलदेवता को भोग लगाते हैं। उसके बाद भोजन करते हैं। इस समाज के लोग काफी सीधे-साधे और ईमानदार होते हैं।
कृषि पर निर्भर रहते हुए अब सीख गए आत्मनिर्भर बनना
थारू समाज के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। वे खेती के साथ ही गाय, भैंस, सुअर, बकरी व मुर्गापालन करते हैं। आधुनिकता की इस बयार में अब थारू समाज भी आधुनिक होता जा रहा हैं। थारू समाज की महिलाओं का हस्तशिल्प तो पूरे देश में अपनी पहचान बना चुका है। थारू हस्तशिल्प को एक जिला एक उत्पाद में भी चयनित है। दुधवा टाइगर रिजर्व में आने वाले सैलानी थारू लोकनृत्य देखने और हस्तशिल्प से तैयार वस्तुओं को खरीदकर अपने घर की शोभा बनाने को लालायित रहते हैं।