बांकेगंज। बसंत के मौसम में होली के नजदीक आते ही टेसू (पलाश) के पेड़ों पर खिले लाल फूल धरती की हरी साड़ी पर लाल बूटे की तरह नजर आ रहे हैं। प्रकृति का यह नजारा इन दिनों देखते ही बन रहा है।
ब्रह्म कमल की जगह उप्र सरकार ने दस जनवरी 2011 को टेसू (पलाश) के फूल को स्टेट फ्लावर घोषित कर दिया था। यह फूल न केवल बेहद खूबसूरत है, बल्कि औषधीय गुणों से भी भरपूर है। पलाश शुष्क, कंकरीट और बलुई मिट्टी में होता है। गांवों में इसे ढाक कहते हैं। मार्च-अप्रैल के बीच पलाश के पेड़ों में लाल रंग के फूलों के गुच्छे निकलते हैं, जो देखने में बहुत सुंदर लगते हैं। बांकेगंज, मैलानी, भीरा, पलिया समेत तराई के जंगलों, सड़कों और रेल ट्रैक के किनारे इनके बहुतायत में पेड़ देखे जा सकते हैं।
पलाश से बनते हैं होली के रंग
मध्य प्रदेश और बुंदेलखंड के इलाके में इसके जंगल पाए जाते हैं। वहां के बाशिंदे इसे फायर फ्लेम के नाम से जानते हैं। पुराने जानकार आज भी होली पर रासायनिक और सिंथेटिक रंगों का प्रयोग न कर पलास के फूलों को एकत्र कर बड़े बर्तन में उबालकर इसका रंग बनाते हैं और इसके गुनगुने अर्क से होली खेलते हैं। इसके अर्क से नहाने पर चर्म रोग नहीं होते।
चर्म रोगों के लिए पलाश के फूल रामबाण
पलाश के फूल चर्म रोगों के लिए रामबाण औषधि हैं। बांकेगंज कस्बा के आयुर्वेदाचार्य डॉ. सुनील वर्मा का कहना है कि इसके फूलों को उबालकर उसका अर्क त्वचा पर लगाया जाता है। साथ ही इन दिनों फूलों के अर्क से स्नान करने से बरसात में होने वाले चर्म रोग नहीं होते। कस्बा के पंडित कुसुम कुमार शास्त्री का कहना है कि ऐसी मान्यता है कि हर छठ पर्व पर भगवान श्रीकृष्ण ढाक के पत्ते में ही दही खाते थे।