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ऐसे भी विधायक : बंशीधर शुक्ल की सादगी और फक्कड़पन की दी जाती हैं मिसालें

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पंडित बंशीधर शुक्ल (फाइल फोटो)
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04 एलकेएच 01, 02
ऐसे भी विधायक : बंशीधर शुक्ल की सादगी
और फक्कड़पन की दी जाती हैं मिसालें
- गरीबों और जरूरतमंदों से भरा रहता था उनका विधायक निवास, खुद दरी बिछाकर सो जाते थे बाहर
अशोक निगम
लखीमपुर खीरी। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान अपनी जोशीली कविताओं से क्रांतिकारियों के दिलों में आग भरने वाले पं. बंशीधर शुक्ल 1957 के विधानसभा चुनाव में जिले की श्रीनगर सीट से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर विधायक बने। उनकी सादगी और फक्कड़पन की लोग उस समय भी मिसालें दिया करते थे। पंडित जी की शनिवार को जयंती मनाई जाएगी।
जिले के वरिष्ठ अधिवक्ता राजकुमार त्रिवेदी बताते हैं कि जब पं. बंशीधर शुक्ल विधायक थे, उस समय वह उनके दारुल शफा स्थित विधायक आवास पर ही रहकर वकालत की पढ़ाई कर रहे थे। वह बताते हैं कि उनको आवंटित विधायक आवास हमेशा खीरी जिले के विपन्न और असहाय लोगों से भरा रहता था। शुक्ल जी को अक्सर अपने फ्लैट से बाहर सोना पड़ता था। वह कभी लॉन में तो कभी बरामदे में सोकर रात गुजार लेते थे।
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राज कुमार त्रिवेदी बताते हैं कि गर्मियों के मौसम में एक बार उनका फ्लैट उनके जिले से आए हुए लोगों से भरा हुआ था। शुक्ल जी रात में विधायक निवास में सड़क किनारे लॉन में दरी बिछाकर लेटे हुए थे। अचानक तत्कालीन मंत्री राममूर्ति की कार विधायक निवास में दाखिल हुई। कार से बाहर निकलते ही उनकी नजर लॉन में चादर तानकर सो रहे पंडित बंशीधर शुक्ल पर पड़ी, चादर से चेहरा ढका होने के कारण वे उन्हें पहचान नहीं सके। उन्होंने चौकीदार से पूछा, यहां इतनी रात में कौन और क्यों सोया हुआ है। इसे यहां से जाने को कहो। इसी बीच बंशीधर की नींद खुल गई और वह उठकर बैठ गए। मंत्री राममूर्ति उन्हें देख कर हक्का बक्का रह गए। उन्होंने शुक्ल जी से माफी मांगते हुए कहा मेरी वजह से आप को तकलीफ हुई, मुझे इसका बहुत अफसोस है। शुक्ला जी ने कहा मुझे ऐसी बातों से कोई तकलीफ नहीं होती। तकलीफ तो आप को हुई आगे भी होगी जब यह कार बंगला सब छूट जाएगा।
राज कुमार त्रिवेदी ने बताया कि जब वह विधायक थे तब भी उनके पास पहनने लायक केवल एक जोड़ी धोती कुर्ता था। विधानसभा सत्र के दौरान वह यह धोती कुर्ता पहनकर जाते और जब वह लौटकर आते तो मैं या उनके पुत्र सत्यधर शुक्ल उस धोती कुर्ते को धोकर सुखा देते। अगले दिन वह फिर वही कपड़े पहन लेते। राज कुमार त्रिवेदी बताते हैं कि एक बार जिद कर हम लोग उनके लिए खादी भंडार से दो जोड़ी धोती कुर्ते ले आए। अगले दिन वह नया धोती कुर्ता पहनकर विधानसभा गए। लौटकर जब घर आए तो उनके गांव से किसी व्यक्ति ने कह दिया। वाह पंडित जी आज तो नया धोती कुर्ता है। विधायकजी ने एक नजर उसके फटे पुराने कपड़ों पर डाली और तुरंत ही धोती कुर्ता उतार कर उसे दे दिया। लाख मना करने के बाद भी उसे नया धोती कुर्ता पहनाकर ही माने।
राजकुमार त्रिवेदी ने बताया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद बंशीधर शुक्ल की कविताओं के बड़े प्रेमी थे। एक बार उन्होंने शुक्ल जी को मुख्यमंत्री आवास पर काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया। काव्य पाठ के बाद डॉ. संपूर्णानंद ने बड़ी श्रद्धा के साथ उन्हें एक कीमती शाल भेंट की। जाड़े की रात थी। बंशीधर शुक्ल पैदल ही अवधी कवि और गीतकार लवकुश दीक्षित के साथ घर लौट रहे थे। अचानक उनकी नजर फुटपाथ पर चीथड़ों में लिपटी एक गठरी पर पड़ी। शुक्ल जी ने पास जाकर देखा तो वहां एक व्यक्ति भीषण ठंड से कांप रहा था। शुक्ल जी ने तुरंत मुख्यमंत्री की दी हुई शाल ओढ़ा दी, और आगे बढ़ गए। लवकुश दीक्षित ने कहा मुख्यमंत्री ने बड़े ही प्यार और श्रद्घा से आपको यह शाल भेंट की थी, आपने इसे दे दिया तो शुक्ल जी तपाक से बोले, क्या मैने इसे प्यार से शाल नहीं दी है। बंशीधर शुक्ल ने विधायक के रूप में मिलने वाले वेतन भत्ते का एक भी पैसा अपने या अपने परिवार नहीं खर्च किया वह इस धनराशि को गरीबों और जरूरतमंदों पर खर्च करते थे, कहते थे यह तो जनता जनार्दन का पैसा है। (संवाद)
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अवधी सम्राट के नाम से जाने जाते
हैं पं. बंशीधर शुक्ल, आज है जयंती
उठ जाग मुसाफिर भोर भयो...., उठो सोने वालों सबेरा हुआ है वतन के फकीरों को फेरा हुआ है....जैसे कालजयी गीतों और आजाद हिंद फौज के मार्चिंग सांग ‘कदम कदम बढ़ाए जा खुशी के गीत गाए जा’ के रचनाकार पं. बंशीधर शुक्ल का जन्म वसंत पंचमी 1904 के जिले के मन्यौरा गांव में हुआ था। शनिवार को वसंत पंचमी के दिन उनकी 118वीं जयंती मनाई जा रही है। किसानों और ग्रामीण जीवन का काव्य चित्रण करने के साथ अन्याय और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले स्वभाव से एकदम फक्कड़ बंशीधर शुक्ल आजादी के पहले और आजादी के बाद भी हमेशा विद्रोही ही बने रहे। आजादी के बाद भी सिस्टम की खामियों पर जमकर अपनी लेखनी चलाई।
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