चुनाव लड़ने के लिए नहीं थे पैसे, दूसरों की मदद से चला काम
राजकुमार त्रिवेदी, वरिष्ठ अधिवक्ता
आजादी के बाद विधानसभा का दूसरा चुनाव 1957 में हुआ। आजादी के पहले तक निष्ठावान कांग्रेसी रहे अवधी सम्राट, कवि और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित बंशीधर शुक्ल श्रीनगर विधानसभा क्षेत्र से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े। उनका चुनाव निशान झोपड़ी था। उन दिनों मेरा विद्यार्थी जीवन था। उसी साल बीए पास किया था। चुनाव शुरू हुआ तो दस विद्यार्थियों की अपनी टोली के साथ पंडित जी के चुनाव प्रचार में जुट गया। उन दिनों आज जैसे साधन और संसाधन नहीं थे। पं. बंशीधर शुक्ल के पास चुनाव लड़ने को पैसे तक नहीं थे। लखीमपुर के टुन्नू सिंह और गोला के चौधरी राम सिंह जैसे कुछ शुभचिंतकों की मदद से चुनाव प्रचार के लिए एक पुरानी जीप का बंदोबस्त किया गया। इस जीप से कार्यकर्ताओं को गांवों तक छोड़ दिया जाता था जहां से वे पूरे चुनाव भर जनसंपर्क और प्रचार करते थे और मतदान निपटने के बाद ही लौटते थे।
बंशीधर शुक्ल खुद पैदल ही चुनाव प्रचार के लिए निकलते थे या कभी-कभार साइकिल से। साथ में न कोई तामझाम होता था न सुरक्षा का इंतजाम। गांवों की साप्ताहिक बाजारों में मजमा इकट्ठा कर लोगों से अपनी बात कहते और फिर आगे बढ़ जाते। गांवों में जाकर मुखिया या प्रधान के यहां चौपाल लगाकर लोगों से बात करते थे।
उन दिनों चुनावों में धनबल और बाहुबल का बोलबाला नहीं था। चुनाव प्रचार के दौरान कोई उम्मीदवार या कार्यकर्ता एक-दूसरे पर कीचड़ नहीं उछालते थे। चुनाव प्रचार अपनी बात कहने और लोगों तक चुनाव निशान पहुंचाने तक सीमित रहता था। पं. बंशीधर शुक्ल की कविताएं उन दिनों काफी लोकप्रिय थी। व्यवस्था, राजनीति और समाज में बदलाव पर आधारित शुक्ल जी की कविताओं को हम विद्यार्थी गांव-गांव में सुनाकर उनके लिए वोट मांगा करते थे। उनकी कविताओं का मतदाताओं पर काफी अच्छा प्रभाव पड़ता था। उनके इस चुनाव में चंदे से मिले मात्र 6200 रुपये ही खर्च हुए थे।
चुनाव जीतने के बाद समर्थकों ने दिलाया दूसरा
धोती-कुर्ता, वह भी जरूरतमंद को बांट दिया
राजकुमार त्रिवेदी बताते हैं, चुनाव जीतने पर पं. बंशीधर शुक्ल को दारुलशफा लखनऊ में दो कमरों का आवास रहने को मिला जो अक्सर खीरी जिले के लोगों से भरा रहता था। विधायक बनने के बाद भी उनके पास सिर्फ एक कुर्ता और एक धोती थी। दिन भर के बाद जब वह शाम को वह घर लौटते तो हम लोग उनका धोती कुर्ता धो दिया करते थे। सूख जाने पर अगले दिन वह फिर वही धोती कुर्ता पहन लेते थे। काफी जिद करके 20 रुपये में दो धोती और दो कुर्ते उनके लिए ले आए जो मुश्किल से दो चार दिन ही उन्होंने पहना होगा, फिर वह धोती कुर्ता भी जरूरतमंदों में बांट दिया। विधायक बनने के बाद भी वह ट्रेन से लखनऊ आते-जाते थे। क्षेत्र में भ्रमण पैदल या साइकिल से ही करते थे।