लखीमपुर/ओयल। हेपेटाइटिस की रोकथाम के लिए स्वास्थ्य विभाग भले ही कागजों पर दावों की घोड़े दौड़ा रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है। विभागीय सुस्ती की वजह से लोगों में बीमारी में जागरूकता की कमी है। इससे जिला अस्पताल में ही इस रोग के मरीज लगातार इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। चिकित्सकों का कहना है कि थोड़ी सी लापरवाही करने पर गंभीर दिक्कत हो सकती है।
जिला अस्पताल में ही हेपेटाइटिस के करीब 250-300 मरीज प्रतिमाह इलाज के लिए आते हैं, जबकि जिला अस्पताल की पैथोलॉजी की जांच में भी प्रतिमाह 25-30 लोगों में हेपेटाइटिस के लक्षण सामने आ रहे हैं। स्क्रीनिंग और फॉलोअप की प्रक्रिया बेहद धीमी है। कई गांवों में तो लोगों को यह तक नहीं पता कि हेपेटाइटिस कैसे फैलता है और इसकी जांच कहां कराई जा सकती है।
जिला अस्पताल के डॉ. संतोष कुमार मिश्रा ने बताया कि हेपेटाइटिस बी और सी गंभीर बीमारी है। इसमें हेपेटाइटिस बी तेजी से फैलता है, जबकि सी ब्लड के रास्ते दूसरे व्यक्ति को संक्रमित करता है। हेपेटाइटिस सी फैलने की जानकारी जल्दी नहीं हो पाती है, इसलिए यह अधिक गंभीर है। संतोष मिश्रा ने बताया कि यह बीमारी खून के संपर्क, संक्रमित सिरिंज या असुरक्षित यौन संबंध से फैलता है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में जागरूकता की कमी के कारण लोग शुरुआती लक्षण जैसे थकान, पीलापन, भूख न लगना या पेट दर्द को मामूली मानकर नजर अंदाज कर देते हैं।
-लिवर कैंसर का होता है खतरा
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते हेपेटाइटिस की पहचान और इलाज नहीं हुआ तो यह लिवर सिरोसिस या लिवर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों में बदल सकता है। हालांकि, पहले इस वायरस की दवा नहीं तो दिक्कत थी। अब दवाईयां आ गईं हैं। इसलिए मरीज को ऐसे कोई लक्षण दिखे तो लापरवाही न करते हुए जिला अस्पताल में अपना इलाज कराएं।