लखीमपुर खीरी। जल, जंगल और जमीन प्रकृति के तीन बड़े और महत्वपूर्ण घटक हैं। इनके बिना प्रकृति की कल्पना संभव नहीं। खीरी इन तीनों तत्वों से मालामाल है, लेकिन बढ़ती शिकार की घटनाओं से जनपद की प्राकृतिक व्यवस्था को बनाए रखना वन विभाग के पास कड़ी चुनौती है।
जिले का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 7680 वर्ग किलोमीटर है। इसमें 1274 वर्ग किलोमीटर यानी 127400 हेक्टेयर क्षेत्रफल में जंगल है। इस तरह जिले के कुल क्षेत्रफल में 16.59 फीसदी वनक्षेत्र है। यह जंगल बाघ, तेंदुआ, हाथी, गैंडा, हिरन आदि दुर्लभ वन्यजीवों से भरे पड़े है, जो यहां की समृद्घ जैव विविधिता की मिसाल है। जंगल बेशकीमती साल और सागौन के पेड़ों से आच्छादित है। देश के अंदर पाई जाने वाली शायद ही ऐसी कोई वनस्पति हो यहां के जंगल में न मिलती हो। इस तरह यहां की वानस्पतिक विविधता भी अपने आप में अनूठी है।
जिले में शारदा, घाघरा जैसी बड़ी नदियों के अलावा दर्जनों छोटी और सहायक नदियां है, छोटे-बड़े सैकड़ों तालाब और झीलें हैं, जिनमें मगरमच्छ, घड़ियाल, विभिन्न प्रजातियों की मछलियां मिलती हैं। इन जलाशयों पर पूरे साल रंग बिरंगे परिंदे दिखाई देते हैं। यही नहीं सर्दियों के मौसम में ठंडे देशों से बड़ी संख्या में प्रवासी परिंदे आकर यहां चार महीने प्रवास करते हैं। जिले की समृद्घ जैव विविधता के कारण ही यहां दुधवा टाइगर रिजर्व की स्थापना की गई थी।
90 हजार हेक्टेयर वनक्षेत्र पर लोगों के हैं कब्जे
जिले में करीब 90 हजार हेक्टेयर वनक्षेत्र पर लोग अवैध कब्जा कर खेती कर रहे हैं। इससे वन्यजीवों का प्राकृतवास छिन रहा है। खेतों में अंधाधुंध कीटनाशक और खरपतवार नाशक दवाओं के इस्तेमाल के कारण नदियों, तालाबों का पानी प्रदूषित हो रहा है। इससे जलीय जीवों पर संकट मंडरा रहा है। भूजल के अंधाधुध दोहन से खीरी जिले में भूजल का स्तर नीचे गिर रहा है। लगातार हरे भरे पेड़ों के कटान से पर्यावरण असंतुलित होने की कगार पर है।
बाघों के संरक्षण के लिए प्रकृति का संरक्षण जरूरी है। स्वस्थ प्रकृति में ही जैव और वानस्पतिक विविधता समृद्घ रहती है। वन विभाग जंगलों की सुरक्षा के साथ-साथ प्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए प्रयत्नशील है। प्रकृति सुरक्षित रहेगी तभी मानव सभ्यता भी सुरक्षित रह सकेगी। इसके लिए आम लोगों को भी जागरूक होने की जरूरत है।
- डॉ. अनिल कुमार पटेल, उपनिदेशक दुधवा टाइगर टाइगर रिजर्व, बफर जोन