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सांसद ने याद की जिले के क्रांतिकारियों की कुर्बानी

Fri, 11 Aug 2017 11:23 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो लखीमपुर खीरी।
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स्वतंत्रता आंदोलन - फोटो : अमर जउलाा
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कहा, पं. राजनरायण मिश्र और बंशीधर शुक्ल के नाम का बने स्मारक 
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खीरी सांसद अजय मिश्र टेनी ने जिले में स्वतंत्रता आंदोलन के अगुआ रहे क्रांतिकारी पंडित राज नरायण मिश्र और पं. वंशीधर शुक्ल की कुर्बानी को याद किया है। उन्होंने सदन के माध्यम से भारत सरकार से मांग की है कि जिले में दोनों क्रांतिकारियों के नाम के स्मारक बनाए जाने चाहिए। 
सांसद टेनी ने संसद सत्र में कहा कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में आठ और नौ अगस्त का बड़ा महत्व है। क्योंकि नौ अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ हुआ था। इसकी आठ अगस्त 1942 को घोषणा की गई थी। भारत छोड़ा आंदोलन में आखिरी फांसी जिले के गांव भीखमपुर निवासी पं. राजनरायण मिश्र को हुई थी, जबकि इस आंदोलन के मन्योरा निवासी पं. बंशीधर शुक्ल अगुआ था। पंडित बंशीधर शुक्ल के गाए गीतों को गांधीजी की प्रार्थना सभा और सुभाष चंद्र बोस की फौज भी गाती थी। उन्होंने सदन के माध्यम से भारत सरकार से दोनों क्रांतिकारी पंडित राज नरायण मिश्र और पं. वंशीधर शुक्ल के नाम से जिले में स्मारक बनवाने की मांग उठाई है।  
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27 जून 1944 को दी गई थी पंडित राजनरायण को फांसी 
जिले के राजनरायन मिश्र को दी गई फांसी स्वतंत्रता आंदोलन की अंतिम फांसी थी। जिलेदार की हत्या के आरोप में फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद से फांसी दिए जाने के समय तक शहादत के जोश में राजनरायन मिश्र का वजन छह पौंड बढ़ गया था। यह देख अंग्रेज भी हतप्रभ रह गए।  
सशस्त्र क्रांति के लिए शस्त्र एकत्र करने के लिए वह महमूदाबाद रियासत के जिलेदार से बंदूक मांगने उसके घर पहुंचे। बंदूक मांगी तो उसने बंदूक देने की बजाय राजनरायन पर ही तान दी। जिलेदार को खुद पर हमलावर होते देख राजनरायन ने उसकी बंदूक छीनकर उसे गोली से उड़ा दिया और फरार हो गए। गिरफ्तारी होने पर मुकदमा चला और 27 जून 1944 को उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। नौ दिसंबर 1944 की सुबह उन्हें लखनऊ जिला जेल में फांसी पर लटका दिया गया। उस समय उनकी उम्र महज 24 साल थी।  
 
कविताओं से क्रांति की मशाल रोशन की थी पंडित बंशीधर ने 
स्वाधीनता आंदोलन में कवि पं. बंशीधर शुक्ल ने अपनी कविताओं से क्रांति की मशाल रोशन की। आम लोगों की बोलचाल अधिकांश अवधी बोली में लिखी उनकी कविताओं और गीतों ने क्रांतिकारियों में जोश भरने का काम किया। जिले के मन्यौरा गांव में बसंत पंचमी 1904 को जन्मे पं. बंशीधर शुक्ल ने क्रांति की ओर रुझान बढ़ा और वह देशभक्ति की कविताएं लिखने लगे। सन 1928 में बंशीधर शुक्ल महात्मा गांधी के आह्वान पर कांग्रेस में शामिल हो गए। दम-दम कांड के बाद बंशीधर शुक्ल ने एक बेहद क्रांतिकारी कविता लिखी। यह लंबी कविता खूनी परचा के नाम से प्रसिद्ध हुई। गणेश शंकर विद्यार्थी की प्रेरणा से लिखी गई यह कविता पूरे देश में एक ही रात में रिलीज की गई।  
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सांसद बोले, साउथ अफ्रीक की तर्ज पर स्मारक बनवाने की है योजना 
सांसद अजय मिश्र टेनी का कहना है कि जिले में क्रांतिकारियों के नाम से स्मारक बनवाने की प्रेरणा उन्होंने साउथ अफ्रीका से ली है। वह जब एक डेलीगेशन के साथ साउथ अफ्रीका गए तो वहां देखा कि उन लोगों ने अपने शहीदों का एक संग्रहालय बनवाया है। उसी तर्ज पर जिले में एक ऐसा संग्रहालय बनवाने की योजना है, जो पंडित राजनरायण मिश्र और पंडित बंशीधर शुक्ल के नाम का स्मारक हो। उसमें जिले में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी चीजों का न सिर्फ संग्रह हो, बल्कि जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के ऐसे चलचित्र हों, जिन्हें देखकर नई पीढ़ी उन्हें हमेशा याद रख सके।
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