सरकार ने किसानों को कृषि उपज की बिक्री के लिए गांवों में उप मंडी स्थल की तर्ज पर लाखों की लागत से एग्रीकल्चर मार्केटिंग हब (एएमएच) का निर्माण कराया। ताकि किसानों को उपज बेचने के लिए दूर न जाना पड़े और उचित मूल्य भी मिल सके, लेकिन हालात इसके उलट हैं। ज्यादातर मार्केटिंग हब निष्प्रयोज्य पड़े हैं। कुछ में रैन बसेरा बना है, तो कहीं लोगों ने अतिक्रमण कर लिया है। किसानों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। जिले में छह मंडियों लखीमपुर, मैगलगंज, मोहम्मदी, गोला, तिकुनिया और पलिया स्थापित हैैं, जिनके क्षेत्र के 68 गांवों में एग्रीकल्चर मार्केटिंग हब बनाए गए हैं। कुछ एएमएच में टिन शेड से आच्छादित चबूतरे के साथ ही आठ कमरे बनाए गए हैं, जिनमें प्रत्येक पर लागत करीब 23 लाख रुपये आई है। वहीं बगैर कमरे के टिन शेड वाले चबूतरे भी बनाए गए हैैं, जिनके निर्माण पर 16 लाख रुपये खर्च हुए हैं। लखीमपुर मंडी के क्षेत्र में 16 एएमएच स्थापित हैैं। इनमें से एक धौरहरा एएमएच का अमर उजाला टीम ने जायजा लिया, तो सभी कमरे बंद मिले। चबूतरे के आधे हिस्से पर तंबू लगाकर रैन बसेरा बनाया गया हैै। किसानों के लिहाज से कोई गतिविधियां संचालित होती नहीं मिली। खास यह हैै कि धौरहरा स्थित एएमएच का निर्माण होने के बाद इसका हस्तांतरण 27 जनवरी 2015 को हो गया था, जिसके बाद एक साल बीत गया। फिर भी किसानों के लिए इसका प्रयोग शुरू नहीं किया जा सका है। वहीं मैगलगंज मंडी समिति के एएमएच मितौली का हाल भी कुछ ऐसा ही मिला, जहां बनाए गए चबूतरे पर कुछ दुकानदारों ने अपना कब्जा जमा लिया है। किसानों के लिए वहां पर न कोई सुविधाएं हैं और न ही कोई व्यवस्थाएं।
किसानों के लिए गांवों में एएमएच स्थापित किए गए हैैं, जहां किसानों के लिए सुविधाएं मुहैया कराई गई है। धौरहरा में दुकानों के एलाटमेंट कर दिए गए हैं। जल्द ही वहां पर किसानों को उपज की बिक्री के लिए सुविधाएं मिलने लगेंगी।
-उमेश यादव, मंडी सचिव, लखीमपुर