केले की फसल से प्रति एकड़ मिल रही औसतन 2.50 लाख की आमदनी
लखीमपुर खीरी। परंपरागत खेती से हटकर खीरी के किसानों ने मिसाल कायम की है। जनपद में मुख्यता गन्ना, धान और गेहूं की खेती बड़े पैमाने पर होती है, लेकिन इससे अलग हटकर भी नगदी फसलों की ओर किसानों का रुझान बढ़ा है। पिछले कुछ सालों में खासकर केले की खेती बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए वरदान साबित हुई है, जिससे किसानों को प्रति एकड़ औसतन 2.50 से तीन लाख रुपये तक मुनाफा हो रहा है।
ईसानगर क्षेत्र के गांव परसिया निवासी किसान कपिल सिंह ने करीब दस साल पहले गन्ने की खेती को छोड़कर केले की खेती को अपनाया था। शुरुआत दो एकड़ से की, जिसके बाद मुनाफा अच्छा मिलने पर उन्होंने केले की खेती का एरिया बढ़ाकर 20 एकड़ कर दिया।
वर्तमान में वह प्रति एकड़ केले की खेती के हिसाब से औसतन 2.50 से तीन लाख रुपये तक मुनाफा कमा ले रहे हैं। कपिल सिंह बताते हैं कि केले के पौधे की रोपाई जून से जुलाई तक की जाती है, जिसके बाद अगस्त से अक्तूबर तक केले की फसल प्राप्त होती है। गन्ने की पौध लगाने से लेकर खाद-पानी लगाने पर प्रति एकड़ करीब 70 से 80 हजार रुपये लागत आती है, जिसे निकालकर औसतन 2.50 लाख रुपये मुनाफा मिल जाता है।
उन्होंने बताया कि केले की पौध लखनऊ या फिर जलगांव महाराष्ट्र से लाते हैं। एक एकड़ में करीब 1250 पौधों की रोपाई की जाती है। कपिल सिंह से प्रेरणा लेकर क्षेत्र के दर्जनों किसानों ने गन्ने को छोड़कर केले की खेती अपनाई है, जिससे ईसानगर क्षेत्र के दर्जनों गांव केले का हब बन चुके हैं। गन्ने की तरह ही केले में एक बार पौधरोपण से दो फसलें (पौध व पेड़ी) मिल जाती हैं।
अमरूद की खेती से ले रहे अच्छा मुनाफा
निघासन। सिंगाही के सुनील बत्रा ने परंपरा खेती को छोड़कर अमरूद की खेती की ओर रुख किया है। सुनील बत्रा ने बताया कि उन्होंने दो एकड़ अमरूद लगाए थे। एक साल में दो बार फल आता है, जिससे अच्छा मुनाफा हो रहा है। उन्होंने बताया कि गेहूं, गन्ना, धान की खेती में लागत अधिक लगती है और मुनाफा कम है। वहीं अमरूद की खेती में लागत कम है और मुनाफा अधिक मिलता है। इससे अमरूद की खेती काफी लाभदायक है। संवाद