अमीरनगर (लखीमपुर खीरी)। प्रेम, एकता, भाईचारे और हंसी खुशी का प्रतीक रंगों का त्योहार होली कस्बे में सदियों से हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल रही है। कसबे में आज भी मुस्लिमों के घरों के सामने होलिका दहन होता है उसके बाद सभी एक साथ मिलकर रंग खेलते हैं और एक-दूसरे को मुबारकबाद देते हैं। यहां पर एक होलिका स्थल मरहूम अख्तर खां के दरवाजे पर तो दूसरा होलिका स्थल मरहूम छेदा अली के दरवाजे पर है। जहां वर्षों से होली हंसी खुशी और भाईचारे के साथ मनाई जाती है। यहां के लोग होली और ईद में कोई अंतर नहीं मानते।
‘मिलकर मनाते हैं होली और ईद’
सूफी सिकंदर शाह दरगाह के सज्जादा नशी सूफी रियाज अहमद मियां कहते हैं यहां दोनों समुदाय के लोग सालों से होली और ईद साथ मिलकर मनाते हैं।
‘सबसे पहले मुस्लिम भाइयों से मिलती है मुबारकबाद’
छोटेलाल कटियार कहते हैं कि होली पर सभी एक दूसरे के घर टोली बनाकर जाते हैं। सुबह सबसे पहले मुस्लिम भाइयों की होली पर मुबारकबाद मिलती है।
‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’
मुन्नन अली हाजी कहते हैं कि त्योहार चाहे किसी धर्म का हो, संदेश एक ही है कि मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना। कसबे में यह तहजीब आज भी बरकरार है।
‘गले मिलने से मिटते हैं गिले शिकवे’
रामचंद्र शर्मा का कहना है कि होली का संदेश है कि वह बातें भूल जाओ जो हो चुकीं। गले मिलने से वर्षों पुराने गिले शिकवे मिट जाते हैं। बुजुर्गों ने जो चलन चलाया था वह आज भी कायम है।
‘पहले धमहर था और जुलूस’
कस्बे के 84 वर्षीय शिवराम रस्तोगी कहते हैं कि पहले गांव के लोग मिलकर धमहर निकालकर होली मिलन करते थे। अब युवा बैंड बाजे के साथ जुलूस निकालते और गुलाल की होली खेलते हैं।