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Kushinagar News: सागरों के पुनरोद्धार से लौटेगी काला नमक धान की असली खुशबू

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सिद्धार्थनगर। तराई की पहचान ‘काला नमक’ धान एक बार फिर चर्चा में है। क्षेत्र के किसानों और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पुराने 10 सागरों और 49 नहरों का पुनरोद्धार हो जाए तो काला नमक की खेती में नई क्रांति आ सकती है और इसकी खोई हुई सुगंध व स्वाद फिर से वापस आ सकते हैं।
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जल संरचनाओं के पुनरोद्धार के साथ ही काला नमक धान की खेती में वह सुनहरा दौर फिर लौट सकता है। किसानों को उम्मीद है कि अगर सागर फिर से लबालब भर जाएं और नहरों में पानी बहे, तो काला नमक की पुरानी महक फिर खेतों से उठेगी।
सिद्धार्थनगर के बर्डपुर क्षेत्र के परसा बेलहरी के किसान प्रह्लाद यादव, अकरम अली बताते हैं, हमारे बुजुर्ग कहते थे कि जब 10 सागर भरे रहते थे और उनसे जुड़ी 49 नहरों में पानी चलता था, तब काला नमक की फसल अलग ही पहचान रखती थी। खेतों में महीनों पानी भरा रहता था। उसी पानी से दाने में खुशबू बसती थी। अब ट्यूबवेल से सिंचाई तो हो जाती है। पानी भी भरपूर नहीं मिल पाता है, जिसकी वजह से अब वह बात नहीं रही। शोहरतगढ़ के प्रगतिशील किसान अमरेश बताते हैं कि काला नमक और सागर का रिश्ता पानी से शुरू होकर पहचान और गुणवत्ता तक जाता है। जब सागर लबालब रहते थे, तब काला नमक की खुशबू भी अपने चरम पर थी।
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उत्पादन बढ़ा पर कमजोर हुई पहचान : बर्डपुर क्षेत्र के बिहारीपुर के किसान अभिषेक चौधरी का कहना है कि बौनी प्रजातियों से उत्पादन जरूर बढ़ा है, लेकिन बाजार में असली काला नमक की मांग आज भी पारंपरिक खुशबू वाली किस्म की ही है। शोहरतगढ़ के किसान अब्दुल रहीम कहते हैं, आज ग्राहक पूछता है कि पुरानी खुशबू वाला काला नमक है क्या? हमें जवाब देने में संकोच लगता है। क्योंकि पानी की कमी और प्रजाति ने उसकी असली पहचान कमजोर कर दी है।
कृषि वैज्ञानिक भी किसानों की बात से सहमत दिखते हैं। कृषि विशेषज्ञ डॉ. एके सिंह बताते हैं, काला नमक धान की पारंपरिक किस्म को लंबे समय तक जलभराव की जरूरत होती है। जब खेतों में प्राकृतिक रूप से पानी भरा रहता है, तो मिट्टी की जैविक गतिविधियां बढ़ती हैं। यही प्रक्रिया दाने की सुगंध और स्वाद को प्रभावित करती है। ट्यूबवेल की सिंचाई से यह संतुलन पूरी तरह नहीं बन पाता।
लौटेगी उत्पाद की गुणवत्ता : कृषि विशेषज्ञ प्रो. आरपी त्रिपाठी का कहना है कि काला नमक केवल एक फसल नहीं बल्कि इस क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर है। इसकी ब्रांड वैल्यू अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है। यदि जल संरचनाओं को पुनर्जीवित कर दिया जाए तो किसान फिर से पारंपरिक किस्मों की ओर लौटेंगे और उत्पाद की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होगा।
किसानों का यह भी मानना है कि सागरों के पुनरोद्धार से केवल धान की खेती ही नहीं, बल्कि पूरे ग्रामीण तंत्र को लाभ मिलेगा। बांसी क्षेत्र के किसान हरिकेश चौधरी कहते हैं, सागर भरेंगे तो मछली पालन भी बढ़ेगा, पशुओं को पानी मिलेगा और गांव का जलस्तर सुधरेगा। इससे खेती टिकाऊ बनेगी।
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