पडरौना। 2021 में अमेरिका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के एक शोध और अध्ययन के बाद पुराने नंबर के बंद होने और तीन माह बाद फिर से टेलीकॉम कंपनी की ओर से इसे रिसाइकल कर किसी नए उपभोक्ता को देने से जुड़े तथ्य साझा किए।
पुराने से नए उपभोक्ताओं को सिम अलाॅट होने के बीच डाटा एक्सेस को लेकर लोगों को आगाह भी किया। इसका अध्ययन भले ही आम लोगों ने न किया हो, लेकिन ठगों ने इस पर खूब काम किया है। टेलीकॉम कंपनियों के इस लूपहोल का फायदा उठाते हुए कम उम्र के लड़कों ने ठगी के लिए इसे ढाल बना लिया।
योजनाबद्ध तरीके से एक संगठित गिरोह के माध्यम से नंबर के माध्यम से आधार और आधार के माध्यम से बैंक खाता पता कर सीएसपी संचालक को कमीशन का लालच देकर ठगी का जाल तैयार कर दिया। ठगी और गिरोह को लेकर चर्चित कुशीनगर में ठगी के नए तरीके से सब हैरान हैं।
साइबर एक्सपर्ट बताते हैं कि पुराने नंबर से जुड़े नए उपयोगकर्ता केवल आधार और बैंक ही नहीं बल्कि तमाम सोशल मीडिया अकाउंट, जीमेल आदि में भी मोबाइल नंबर के माध्यम ओटीपी से एक्सेस हासिल कर लेते हैं। नया फोन नंबर अपडेट न करना लोगों के लिए नई मुश्किलें पैदा कर सकता है।
तकनीक में बढ़ोतरी होने के साथ ही फ्राड और स्कैम तेजी से बढ़ रहे हैं। मोबाइल कंपनियां अक्सर पुराने नंबरों को तीन माह बंद होने के बाद रिसाइकल (पहले से इस्तेमाल की गई सामग्री को फिर से नई चीजों में बदलना) कर देती हैं और नए यूजर को असाइन कर देती हैं। इसी का फायदा ठग उठा रहे हैं। पिछले दिनों पुलिस ने ऐसे ठगों को गिरफ्तार किया जो लोगों के बंद हो चुके पुराने नंबर को निशाना बनाकर बैंक से रुपये निकाल लेते थे। इस बीच आधार कार्ड की यूआईडीएआई पोर्टल से भी यह जानकारी हासिल करते हैं। कुशीनगर में हुए खुलासा में यह पता चला कि अभियुक्तों का एक संगठित गिरोह है जो जिले के अलावा पूरे पूर्वांचल में सक्रिय है।
ठगों ने जांच के दौरान पुलिस को बताया था कि ऐसे मोबाइल नंबर जो लोगों के बैंक खातों में लिंक रहते हैं व किसी कारण से बंद हो जाते हैं तथा खाते से लिंक मोबाइल नंबर को लोग बदलते नहीं हैं और भूल जाते हैं। ऐसी स्थिति में ठग ऐसे नंबरों की खोज कर री-अलाॅट करा लेते हैं। इसके बाद मोबाइल नंबर से माई आधार एप के माध्यम से पुराने मोबाइल नंबर धारक के आधार कार्ड नंबर भी प्राप्त कर लिया जाता है। इसके बाद पुराने मोबाइल नंबर धारक के आधार कार्ड नंबर व लिंक मोबाइल नंबर का प्रयोग कर फोन-पे बना लेते हैं।
आरोपियों को फोन-पे बनाने के दौरान अलग-अलग सीएसपी संचालकों से उक्त बैंक खाते में रुपयों का स्कैनर के माध्यम से ट्रांसफर करा लिया जाता है और इसके एवज में एक निर्धारित कमीशन राशि भी फिक्स की जाती है। इसके अलावा लोन दिलाने के नाम पर भी ठगी का मामला आया।