डिपो बनने के नौ साल बाद भी नहीं सुधरी व्यवस्था
- पडरौना रोडवेज बस स्टेशन परिसर में शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं
- शाम सात बजे के बाद कहीं के लिए नहीं मिलती रोडवेज की बस
- बस स्टेशन भवन जर्जर होने से उसमें नहीं बैठते हैं रोडवेज कर्मचारी
- लखनऊ व दिल्ली ले जाने वाले बस चालक व परिचालक भी बस में गुजारते हैं रात
संवाद न्यूज एजेंसी
पडरौना। शहर में स्थित रोडवेज बस स्टेशन को डिपो का दर्जा मिले नौ साल गुजर चुके हैं, लेकिन सुविधाएं नहीं बढ़ी हैं। ठंड हो या गर्मी शाम सात बजे के बाद बस स्टेशन से कहीं के लिए कोई बस नहीं मिलती है। कोई पूछताछ काउंटर नहीं है। स्टेशन परिसर में उद्घोषक नहीं होने से यात्रियों को बसों के बारे में जानकारी भी नहीं मिलती।
बस स्टेशन परिसर जर्जर होने से अधिकारी-कर्मचारी बस स्टेशन से करीब एक किलोमीटर दूर वर्कशाप में बैठते हैं। बस स्टेशन परिसर में न तो शुद्ध पेयजल का इंतजाम है और न ही यात्रियों और चालक परिचालकों के लिए बैठने का कोई इंतजाम। इस परिसर में पेयजल के लिए तीन इंडिया मार्का हैंडपंप हैं, जिसमें दो खराब हैं, जबकि चालू हैंडपंप से दूषित पानी निकलता है। यात्रियों को पानी खरीदकर पीना पड़ता है।
पडरौना बस स्टेशन को वर्ष 2012 में डिपो बनाया गया था। इस समय डिपो से परिवहन निगम की 21 बसें संचालित होती हैं। इसमें से एक बस छितौनी-गोरखपुर, एक जटहां बाजार-गोरखपुर, दो लोहिया बसें भेड़िहारी-लखनऊ, तीन बसें पडरौना-दिल्ली, दस बसें पडरौना-लखनऊ और शेष चार बसें डिपो में रिजर्व में रहती हैं। इसके अलावा 14 अनुबंधित बसें भी संचालित होती हैं। इनमें आठ बसें ग्रामीण क्षेत्रों से पडरौना के रास्ते गोरखपुर तक संचालित होती हैं, जो निर्धारित स्थान से सुबह पडरौना से गोरखपुर तक चलाई जाती हैं। यही बसें शाम को सवारियों को लेकर ग्रामीण क्षेत्र के निर्धारित स्थल तक पहुंचती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में नियमित बसों का संचालन नहीं होता है। पडरौना बस स्टेशन से शाम सात बजे के बाद पडरौना-कसया-गोरखपुर को छोड़कर किसी भी मार्ग पर बस सेवा नहीं है। इससे शाम सात बजे के बाद पडरौना में फंसे लोगों के लिए यात्रा करना मुश्किल होता है। ये यात्री या तो निजी वाहनों से घर जाते हैं या देर तक मदद की आश में सड़क पर भटकते हैं।
पडरौना जिला मुख्यालय होने के कारण चारों तरफ से लोग विभिन्न कार्यों से आते हैं, लेकिन पडरौना-तमकुहीरोड, पडरौना-समउर, पडरौना-खड्डा, पडरौना-जटहां बाजार, पडरौना-छितौनी, पडरौना-कप्तानगंज समेत अन्य कई मार्गों पर परिवहन निगम की तरफ से नियमित बसों का संचालन नहीं किया जाता है। इससे लोग निजी वाहनों और टैक्सियों से यात्रा करते हैं। ऐसे में यात्रियों को कम दूरी के लिए अधिक किराया देना पड़ता है।
बारिश होते ही तालाब बन जाता है बस स्टेशन
पडरौना बस स्टेशन अधिक बारिश होने पर तालाब बन जाता है। वजह यह कि स्टेशन परिसर मुख्य सड़क से काफी नीचे है और जलनिकासी का कोई प्रबंध नहीं है। इसके जीर्णोद्घार के लिए लोग प्रदेश के परिवहन मंत्री तक को ज्ञापन दे चुके हैं, लेकिन इसकी सुधि नहीं ली गई।
न समय पर ट्रेन, न अन्य वाहन
कानपुर के लिए बस पकड़ने आए नगर के धनंजय ने बताया कि पडरौना से लंबी दूरी के लिए कोई ट्रेन नहीं चलती है। इसलिए रोडवेज की बस से यात्रा करते हैं, लेकिन यात्रियों के लिए सुविधा के नाम पर कुछ भी नहीं है। दुदही निवासी प्रमोद कुमार ने बताया कि उन्हें पुणे जाना है। देवरिया रेलवे स्टेशन से रात में ट्रेन है। बस के अलावा अन्य कोई साधन नहीं है। अब कौन सी बस कहां जा जाएगी, इसे बताने वाला न कोई कर्मचारी है और न ही कोई अन्य व्यवस्था। इसके चलते बस चालकों से इस बारे में जानकारी लेनी पड़ती है। प्रदीप कुमार ने बताया कि उन्हें दिल्ली जाना है। पडरौना से कोई ट्रेन नहीं है। इसलिए बस से यात्रा करनी पड़ती है। बस पकड़ने आने पर यदि किसी को प्यास लग जाए तो उन्हें पानी खरीद कर पीना पड़ता है। अमिताभ कुमार ने बताया कि जिला मुख्यालय का बस स्टेशन होने के बावजूद यहां न तो यात्रियों के बैठने की व्यवस्था है और न ही शुद्ध पेयजल की। गोरखपुर समेत अन्य बड़े शहरों के लिए दूसरा विकल्प नहीं होने से लोग बस से यात्रा करने के लिए विवश हैं।
पडरौना बस स्टेशन को उच्चीकृत कराने के लिए परिवहन निगम के उच्चाधिकारियों समेत शासन को पत्र भेजा गया है। इसके निरीक्षण के लिए टीम भी आई थी। उच्चीकरण के लिए टीम ने जरूरत बताते हुए उच्चाधिकारियों को प्रस्ताव भेजा है, लेकिन अभी स्वीकृति नहीं मिली है। शासन की तरफ से बस स्टेशन को उच्चीकृत करने की स्वीकृति मिलते ही निर्माण कार्य पूरा कराकर सभी समस्याएं दूर करा ली जाएंगी।
- बिंदू प्रसाद, एआरएम