कसया। बरवा फार्म में राजकीय आलू परिक्षेत्र में उद्यान एवं खाद्य संस्करण विभाग की ओर से आलू उत्कृष्टता केंद्र (सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फाॅर पोटैटो) का काम अंतिम चरण में है। किसानों को उनकी मिट्टी की उर्वरा शक्ति के हिसाब और मनचाहे आलू की प्रजातियों का बीज आसानी से मिलेगा।
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार इस केंद्र से पूर्वांचल में आलू की खेती व पैदावार भी काफी बढ़ेगी। यूपी से लेकर बिहार के किसानों को इसका लाभ मिलेगा। बरवाफार्म में 8.59 करोड़ की लागत से यह तकनीक लगाई जा रही है। एक हेक्टेयर में एरोपोनिक विधि से ब्रीडर सीड का प्रोडक्शन किया जाएगा। केंद्र के संचालन व शोध कार्य के किए टपक सिंचाई विधि व हवा में आलू उत्पादन के लिए एरोपोनिक तकनीकी के लिए प्रशासनिक भवन, प्रयोगशाला कक्ष, नेट हाउस तैयार किया जा चुका है। पोली हाउस का कार्य निर्माणाधीन है। तकनीकी के संचालित होने के बाद यहां के किसान भी इस विधि का प्रयोग कर आलू की खेती करेंगे। इससे में उनके आय में काफी वृद्धि होगी।
एक तरफ किसानों को मौसमी मार झेलनी पड़ती है तो कभी जानवरों भारी नुकसान का सामना करना पड़ता हैं। मौसम की मार के चलते किसान की कभी-कभी जमा पूंजी बर्बाद हो जाती है, लेकिन इस विधि से खेती करने पर किसान मौसम की मार से बच सकते हैं। कभी बारिश तो कभी सूखे की वजह से फसल बर्बाद हो जाती है। इस तकनीकी में तापमान आर्द्रता और प्रकाश के स्तर पर सटीक नियंत्रण रहता है। छोटे-छोटे किसान भी इस विधि से कम जगह में अधिक उत्पादन कर सकते हैं। बरवा फार्म प्रदेश का दूसरा स्थान है। जहां एरोपोनिक विधि से आलू की प्रजाति तैयार किया जाएगा। अभी तक सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश हापुड़ जिले में है।
क्या है एरोपोनिक तकनीकी : एरोपोनिक तकनीक में आलू की लटकती हुई जड़ों से उन्हें पोषण दिए जाते हैं। इसके बाद उसमें मिट्टी और जमीन की जरूरत नहीं होती। विशेषज्ञ कहते हैं कि एरोपोनिक तकनीक से खेती करना किसानों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो रहा है। इससे कम जगह में आलू की ज्यादा पैदावार हासिल कर सकते हैं।
खोली में शांतनु का स्वागत करते कांग्रेस कार्यकर्ता। -संवाद