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Kushinagar News: ब्रांडेड के नाम पर डुप्लिकेसी...दवाएं बढ़ा रहीं मर्ज

Sun, 05 Jan 2025 11:48 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
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पडरौना। शहर से लेकर कस्बे तक ब्रांडेड दवाओं के बाजार पर जेनेरिक का कब्जा हो रहा है। मिलते-जुलते नाम से मिलने वाली यह दवाएं भले ही कारगर न हों, लेकिन धंधेबाज और इसे लिखने वाले डॉक्टर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। इनके सेवन से सेहत तो जल्दी ठीक नहीं हो रही है, लेकिन इसके लिए मरीजों को करीब ब्रांडेड के बराबर ही रकम खर्च करनी पड़ रही है। करोड़ों के इस खेल पर जिम्मेदार अंकुश लगाने में नाकाम हैं।
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डॉक्टरों के अनुसार, इन सबस्टैंडर्ड दवाओं से सबसे बड़ा नुकसान यह है कि ब्रांडेड के समान सामग्री का इस्तेमाल कर बनी इन दवाओं के इस्तेमाल से शरीर में कंपोजीशन के प्रति प्रतिरोध पैदा हो जा रहा है, जिससे यह दवाएं असर नहीं कर रही हैं। इसका नुकसान देर-सवेर मरीजों को ही उठाना पड़ रहा है।
शहर के बाजार में पड़ताल के दौरान गैस की दवा ओमेज एक मरीज ने मांगी तो केमिस्ट ने उसे ओमी नाम की दवा पकड़ा दी। दवा खरीदने वाले ने कुछ कहा तो दुकानदार से उसे इस दवा की खूबियां बतानी शुरू कर दीं। दवा का चार पत्ता खरीदने पर पांच रुपये कम भी कर दिए। दवा की मंडी में ऐसी दवाएं अधिक मात्रा में उपलब्ध बताई जा रही हैं। रेट में दो गुने से तीन गुने का अंतर है। ब्रांडेड बेचने से उतना फायदा नहीं होगा, जितना मिलते जुलते नाम की दवा बेचने से होगा। ऐसे दवा अगर एक लाख की मंगाई जाती है तो सीधे दो से दो से ढाई लाख का फायदा होता है। सिप्रोबिड की जगह सिपोडेक 500 बाजार में मिल रही है। इसी तरह से बीटाडीन की जगह पर सिप्लाडीन मिल रहा है। इसे देखकर सामान्य आदमी समझ नहीं पाएगा। शेलकॉल से मिलता जुलता सिपकॉल बाजार में हैं। यह कैल्शियम की दवा है। इसे इन दिनों में जमकर खपाया जा रहा है। कैडिला कंपनी की स्कीन शाइन इसी नाम से एक दवा बाजार में आई है, उसकी स्पेलिंग में आई की जगह ई का अंतर है। यह चेहरे पर लगाने वाली क्रीम है। डेक्साेरेंज सीरप की जगह पर एक दूसरा सीरप डेक्सोवेंज नाम से सीरप बाजारों में बेचा जा रहा हे। पैकिंग में कुछ खास अंतर नहीं है। इसे भी हर कोई समझ नहीं पाएगा। लो वेट जीएम की तरह से क्रो-वेटा जीएम-दाद खाज खुजली की दवा बाजार में हैं। ऐसी दवाओं के वास्तविक रेट में बहुत अंतर है।
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हरियाणा और हिमाचल प्रदेश और रुढ़की की कंपनियों में बनीं ये दवाएं भी ब्रांडेड के आसपास के ही रेट पर बिकती हैं। असल में दवा खाने वाले को कोई खास नुकसान नहीं होता, इसलिए इसकी कोई शिकायत भी नहीं करता। यही वजह है कि विभागीय उदासीनता या मिलीभगत से करोड़ों का धंधा आसानी से फल-फूल रहा है। पिछले दिनों भारत सरकार की तरफ से कराई गई जांच में 20 से अधिक दवाएं सब स्टैंडर्ड पाई गई थीं। इसके बाद ड्रग विभाग ने यहां की दुकानों की छानबीन शुरू कराई। सूत्रों की मानें तो कई ब्रांडेड कंपनियों का डी माल गोरखपुर आ रहा है। यहां से इन दवाइयों को कुशीनगर शहर और यहां से पश्चिमी चंपारण, गोपालगंज और सिवान तक सीमावर्ती क्षेत्रों में अधिक खपाई का जा रही है। सूत्रों की मानें तो कई कंपनियों की ऐसी दवाएं बाजार में हैं, जिन्हें ग्रामीण क्षेत्र में भेजकर धंधेबाज मोटा मुनाफा कमा रहे हैं।
दवा विक्रेता को उधार में ऐसी दवा मिल जाती : सूत्रों की मानें तो ऑर्डर पर दवा आती हैं। इसे खासकर ऐसे दिन मंगाया जाता है जिस दिन काम का दबाव कम रहता है। ऐसे में पूरी दवा स्टोर कर दूसरे दिन ग्रामीण क्षेत्र के बाजार में भेज दिया जाता है। इसका धंधा करने वाले अपनी गाड़ियों से माल पहुंचवाते हैं। खास बात यह है कि दवा विक्रेता को उधार में भी ऐसी दवाएं दे जाती हैं। इसे बेचकर वे जल्दी से रकम चुकाने की कोशिश करते हैं। सप्ताह या 15 दिन के अंतराल में एजेंट को रकम लेने के लिए पहुंचते हैं। इसका कोई बिल बाउचर नहीं बनता। सारा काम नकदी होता है।
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