फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

फिर धूमिल हुई चीनी मिल के चलने की आस

Mon, 20 Oct 2014 05:30 AM IST
Kushinagar
विज्ञापन
विज्ञापन
पडरौना। एक तरफ पडरौना चीनी मिल चलने के आसार दिख रहे थे और वहीं दूसरी ओर चीनी मिल को नीलाम करने की तारीख मुकर्रर कर दी गई है। नीलामी की सुनकर मिल कर्मचारियों और किसानों की पेशानी पर बल पड़ गए हैं।
विज्ञापन

बृहस्पतिवार को गन्ना मूल्य और मजदूराें के बकाए में प्रशासन ने मिल की संपत्ति को कुर्क कर दिया। मिल प्रबंधन की ओर से भुगतान नहीं किए जाने की दशा में एक माह बाद मिल को नीलाम करने की कार्रवाई संभावित है। हालांकि बीते वर्ष भी इस मिल को नीलाम करने की नोटिस जारी हुई थी, लेकिन नीलामी नहीं हो पाई।
मजदूराें का नौ महीने का वेतन दिलाने के लिए बीती सदी के छठे दशक में पडरौना रियासत की ओर से स्थापित यह मिल पहली बार मूंदरा नामक व्यापारी को नीलाम की गई थी। दशक भर बाद ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन ने मिल की जिम्मेदारी संभाली। कानपुर शुगर वर्क्स लिमिटेड की पडरौना यूनिट की इस मिल की बीमार हालत को देखते हुए बीआईसी ने बायफर में अपील की और आईएफसीआई की देखरेख में मिल चलने लगी। वर्ष 1998 में बंद पड़ी चीनी मिल पर बकाया राशि चुकता करने की शर्त पर गंगोत्री इंटरप्राइजेज को मिल चलाने के लिए मिली। मिल तो नहीं चली, अलबत्ता स्टाक में पड़ी 60 हजार बोरी चीनी और मरम्मत के नाम पर बहुत सी मोटर मिल से बाहर भेज दी गई।
विज्ञापन

अगस्त-सितंबर 2000 में किसानों और मिल मजदूरों ने आंदोलन छेड़ दिया, जिसमें पुलिस की गोली से चौरिया गांव के भूलन की जान चली गई। इस आंदोलन के बाद गंगोत्री इंटरप्राइजेज का हक खारिज कर दिया गया। वर्ष 2003 में जेएचवी ग्रुप पुरानी शर्तों के अनुसार ही चीनी मिल का चार्ज लेने के लिए आगे आया। जेएचवी ग्रुप की ओर से कमान संभालने के बाद 2005 में मिल ने लगभग 17 लाख क्विंटल गन्ना की पेराई की। इस वर्ष मिल मुनाफे में रही। लेकिन बाद के वर्षों में मिल को क्षमता के मुताबिक पेराई के लिए गन्ना नहीं मिला। गन्ना मूल्य भुगतान सुचारु ढंग से नहीं होने के कारण किसान भी गन्ना देने में हिचकते रहे। नतीजा यह हुआ कि मिल 2012 तक पेराई करने के बाद बंद हो गई। मिल चलने में जिनके हित निहित हैं, उनमें से कई कर्मचारी और किसानों ने शासन-प्रशासन के दरवाजे खटखटाए।
हालांकि मिल की कुर्की या नीलामी की वजह रुपये का बकाया है, लेकिन बीते वर्षों आईएफसीआई ने श्रमिक संघों को लिखित सूचना दी थी कि कानपुर शुगर वर्क्स लिमिटेड की तरफ से बैंक के ऋण अदा न करने पर बैंकों ने कंपनी के विरुद्ध एसआरएफए एंड ईएसआई एक्ट 2002 के तहत कार्रवाई कर कानपुर शुगर वर्क्स लिमिटेड की दो इकाइयां कठकुइयां एवं गौरीबाजार का अधिग्रहण कर उनकी संपत्ति बेचकर ऋण वसूल लिया गया और पडरौना तथा मढ़ौरा इकाइयां मुक्त कर दी गईं। मजदूर संघों की बीआईएफआर के चेयरमैन से मांग थी कि मिल को पुन: कपड़ा मंत्रालय के अधीन बीआईसी लिमिटेड के हवाले कर दिया जाए, ताकि किसान और मजदूर निश्चिंत हो सकें।
बीते माह भारत सरकार के कपड़ा मंत्रालय की पहल पर मिल के हालात का जायजा लेने एक टीम आई थी। टीम के दौरे के बाद लोगों को पूरी उम्मीद हो गई थी कि मिल इसी सत्र में चालू हो सकती है। लेकिन मिल की कुर्की के बाद लोगों में निराशा घर करने लगी है।
इस बारे में भाजपा जिलाध्यक्ष लल्लन मिश्र का कहना है कि हम लोगों का हमेशा प्रयास रहा है कि फैक्ट्री चले। इसके चलने से ही किसानों और मजदूरों का भला होगा। हमारा प्रयास अब भी जारी है। दीपावली के बाद सांसद राजेश पांडेय की अगुवाई में हम कार्यकर्ताओं का एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री से मिलने जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक लोग नहीं चाहते कि मिल चले।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें