पडरौना। गन्ना अपनी कुदरती मिठास के लिए हमेशा से सबकी पसंद रहा है, लेकिन अन्य वर्षों के मुकाबले इस साल जिले में चीनी की रिकवरी भी बढ़ी है। यह मुमकिन हुआ है अस्वीकृत प्रजातियों के गन्ने की बुआई बंद कर अगैती गन्ना बोने से। जनपद की चीनी मिलों में इस साल रिकॉर्ड चीनी उत्पादन होने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि गन्ना के उत्पादन में 10 से 15 फीसदी की कमी दर्ज की जा रही है।
जनपद की सभी पांच चीनी मिलों में चीनी का उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ चीनी परता (प्रति क्विंटल गन्ने से बनने वाली चीनी की मात्रा) भी बढ़ा है। तीस साल पहले तक यहां संचालित पडरौना, कठकुइयां, रामकोला (खेतान), लक्ष्मीगंज, छितौनी, खड्डा, कप्तानगंज, रामकोला (पंजाब) और सेवरही सहित नौ चीनी मिलों में से पांच एक-एक कर बंद हो जाने के बाद किसान उपेक्षित थे। गन्ना के प्रति किसानों की बेरुखी का प्रमुख कारण यह था कि न तो गन्ने का उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया जाता था और न चीनी मिलें समय से गन्ना मूल्य का भुगतान करती थीं। इसके चलते गन्ने की खेती के प्रति किसानों का मोह भंग होने लगा था। लेकिन गन्ना विभाग और चीनी मिलों की तरफ से व्यवस्था में सुधार किए जाने के बाद पिछले पेराई सत्र से गन्ने की खेती के प्रति किसानों की रुचि बढ़ी है।
गन्ना विभाग की मानी जाए तो प्रति क्विंटल गन्ना रिकवरी औसतन 10 किलोग्राम होना चाहिए, जिसकी तुलना में इस वर्ष जनपद की कई चीनी मिलों में औसत से अधिक 11.87 फीसदी चीनी की रिकवरी प्राप्त हो रही है। जहां तक चीनी उत्पादन की बात है तो लगभग ढाई महीने में ही चीनी मिलों ने 21.13 लाख क्विंटल से अधिक चीनी उत्पादन कर लिया है, जबकि अभी भी पेराई सत्र कम से कम डेढ़ माह तक चलने की संभावना है। पिछले साल जिले की सभी चीनी मिलों ने मिलकर 26.42 लाख क्विंटल चीनी का उत्पादन किया था, इसकी तुलना में इस पेराई सत्र में करीब 38 लाख क्विंटल चीनी उत्पादन की संभावना जताई जा रही है।
गन्ना के उत्पादन में आई गिरावट
जनपद के किसानों ने इस साल 93 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में गन्ना की बुवाई की थी। इसमें से चीनी मिलों ने अब तक 191 लाख क्विंटल गन्ना की पेराई कर दी है, जबकि पिछले साल चीनी मिलों ने पूरे पेराई सत्र में 343 लाख क्विंटल गन्ना पेरा था। विभाग का कहना है कि इस साल गन्ना के उत्पादन में 10 से 15 फीसदी की कमी आई है।
जिले में बढ़ता जा रहा चीनी उत्पादन
पेराई सत्र- चीनी उत्पादन (लाख क्विंटल में)
2014-15- 22.33
2015-16- 19.65
2016-17- 24.09
2017-18- 26.42
2018-19- 21.13 (अब तक)
डीसीओ वेदप्रकाश सिंह ने बताया कि गन्ना का परता बढ़ने की वजह अस्वीकृत प्रजातियों की बुआई बंद कराकर अगेती प्रजाति के को-118 और को-238 की खेती किया जाना है। इसके साथ ही अनुकूल मौसम और किसानों की तरफ से संतुलित मात्रा में पोषक तत्वों का इस्तेमाल करना भी चीनी उत्पादन बढ़ने की प्रमुख वजह है। इस साल चीनी की रिकवरी बढ़ी है। अभी तक 21.13 लाख क्विंटल चीनी का उत्पादन हो चुका है, जबकि पेराई सत्र जारी है। इस पेराई सत्र में चीनी मिलों में लगभग 38 लाख क्विंटल चीनी उत्पादन होने की संभावना है। उन्होंने सुझाव दिया कि किसान बीज शोधन करके, स्वस्थ और रोगरहित गन्ना के बीज की बुवाई करें। रेड रॉट वाले गन्ना के बीजों की बुवाई न करें।
गन्ना बेचने में सप्लाई टिकट न मिलना बनी मुसीबत
खड्डा। क्षेत्र के गन्ना किसानों को समय से सप्लाई टिकट नहीं मिल पा रही है। जैसे- जैसे समय बीत रहा है वैसे- वैसे छोटे किसानों की दिक्कते भी बढ रही है। गन्ना पर्यवेक्षक व समितियों पर उमड़ रही किसानों की भीड़ से यह साबित हो रही है कि सिस्टम में कहीं न कही गड़बडी जरूर है। लखुआ गांव के रहने वाले राधेश्याम के पास एक एकड़ गन्ना है। पूरा परिवार मिलजुलकर मेहनत किया तो फसल अच्छी हुई ,गन्ना सर्वे भी हुआ ,पांच टेलर गन्ना की जगह एक टेलर का कोटा बनाया गया। जानकारी होने पर कोटा बढाने के लिए तीन माह से दौड़ रहे हैं।इसी परेशानी में जूझ रहे नरायनपुर गांव के किसान हरि बताते हैं कि उनके पिता सीताराम की मौत हो गई तो वह वारिस बनाए गए। इनके पास भी पांच टेलर गन्ना है। अस्सी हजार रुपये का कर्ज है। अब तक एक भी सप्लाई टिकट नहीं मिला। गुरूवार को खडडा गन्ना समिति पहुंचे हरि को सप्लाई टिकट तो नहीं मिला ,दो सौ रूपये में काम कराने का दावा करने वाला दलाल जरूर मिल गया। यह कहानी केवल दो किसानों की नहीं है इस तरह तमाम किसान हाथों में इंतखाप, दरख्वास्त ,आदि कागज लेकर मारे- मारे फिर रहे हैं। तमाम दलाल सक्रिय हो गए हैं।सूत्रो की माने तो गन्ना क्रय- विक्रय करने वाले अपनी सेटिंग कर मन मुताबिक टिकट निकलवाकर ,मजबूर किसानों का गन्ना औने- पौने दाम पर खरीद कर मालामाल हो रहे हैं। खडडा के सीनियर सीडीआई नगेंद्र सिंह ने बताया कि कहीं कोई गड़बड़ी नहीं हुई हैं। बड़ा क्षेत्रफल होने के चलते लोग पूछताछ के लिए काउंटर पर पहुंच रहे हैं। सरकार की प्राथमिकता में छोटे किसान हैं।सप्लाई टिकट छापने के लिए जो एजेंसी नामित है, वहां से गड़बड़ी असंभव है।
शोभित कुमार पांडेय