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सपहां में संचालित खादी ग्रामोद्योग केंद्र में तैयार किया जाता है सूत और खादी के कपड़े

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सपहां के सूत और खादी से 200 महिलाओं को मिली आत्मनिर्भरता
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गुरवलिया बाजार ( कुशीनगर)। फाजिलनगर क्षेत्र के ग्राम पंचायत सपहां में स्थित खादी ग्रामोद्योग में बनाए गए सूत और इससे तैयार कपड़ों की मांग कई प्रांतों में है। एक युवा उद्यमी की इस सकारात्मक सोच ने लगभग 200 महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है। अपनी कार्यस्थली को हथकरघा का हब बनाने की सोच लिए पंकज पांडेय की तरफ से खादी वस्त्रों के लिए सूत तैयार किया जा रहा है।
सपहां निवासी जयप्रकाश पांडेय और उनके पुत्र पंकज पांडेय ने वर्ष 2010 में खादी ग्रामोद्योग की मदद से सूत कताई का कार्य शुरू किया था। इसकी शुरुआत 25 कारीगरों के साथ की गई थी। तब चरखा का ज्ञान न होने से कारीगर चरखा चलाने में असमर्थ थे। उस समय अहमदाबाद से मास्टर ट्रेनर बुलाकर महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया। शुरुआत में पारंपरिक चरखे से कताई होती थी। चूंकि पारंपरिक चरखा एक तकले का होता है, जिससे कामगारों को मजदूरी कम मिलती है। इसलिए वर्ष 2018 में युवा उद्यमी की अभिरुचि को देखकर प्रभावित हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र ने संस्था को काफी सहयोग किया। इसके बाद कलराज मिश्र की पहल पर खादी ग्रामोद्योग बोर्ड की ओर से 100 चरखों की व्यवस्था की गई, जिससे सूत कताई ज्यादा होने लगी। दायरा, उत्पादन और गुणवत्ता बढ़ने पर विभिन्न प्रदेशों में मांग बढ़ने लगी। जब इसकी शुरुआत की गई तब से यह समिति लगातार नए-नए मुकाम हासिल करती रही है। देश के विभिन्न प्रांतों में यहां तैयार सूत और कपड़े बेचे जाने लगे हैं।
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इनका मिला काफी सहयोग-
पूर्व में भारत सरकार के मंत्री व राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल कलराज मिश्र, पूर्व मंत्री ब्रह्माशंकर त्रिपाठी, पूर्व राज्यमंत्री जगदीश मिश्र उर्फ बाल्टी बाबा व क्षेत्रीय विधायक गंगा सिंह कुशवाहा भी उनके सूत से तैयार कपड़ों की सराहना कर चुके हैं। इस संस्था की तरफ से सूत कातने के अलावा कुर्ता, पायजामा, लूंगी, धोती, पैंट, कोट, जैकेट, शर्ट, रूमाल, गमछा, दरी आदि भी बनाया जाता है। कोरोना वैश्विक महामारी में इनकी तरफ से 50,000 मास्क, धागा और रेडीमेड कपड़े बनाए गए हैं।
चार करोड़ रुपये है वार्षिक टर्नओवर
खादी ग्रामोद्योग सपहां के संचालक एवं युवा उद्यमी पंकज पांडेय कहते हैं कि यहां का वार्षिक टर्नओवर वर्ष 2018-19 में साढ़े तीन करोड़ रुपये था। 2019-20 में करीब चार करोड़ रुपये हुआ। उन्होंने बताया कि मौजूदा समय में संस्था की वार्षिक आय लगभग चार करोड़ रुपये है। समिति के सदस्य पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद, बिजनौर, हरदोई, फैजाबाद, आजमगढ़, मऊ, बलिया, देवरिया, गोरखपुर, कसया, पडरौना, तमकुही में समय समय पर अपना स्टॉल लगाते हैं। यहां अभी तक 200 महिलाओं और 25 पुरुषों को आत्मनिर्भर किया जा चुका है। इस रोजगार से जुड़कर महिलाएं आत्मनिर्भर हुई हैं।
क्या कहती हैं समूह की महिलाएं-
- बबिता देवी कहती हैं कि गांव में ऐसा रोजगार मिलने से खुशहाली का एक जरिया मिला। आर्थिक स्थिति काफी हद तक सुदृढ़ हुई। घर के काम के साथ साथ यह काम भी निपटा लेती हूं।
- प्रमिला देवी कहती है कि घर का काम निपटाकर यह भी काम कर लेती हैं। हम मजदूरों का चरखा ही सहारा है। कोरोना काल मे यह चरखा ही सहारा था। मांग के अनुसार अतिरिक्त कार्य भी करती हैं।
- शोभा देवी कहती हैं कि आर्थिक तंगी तो कम होती ही है, सरकार द्वारा प्रोत्साहन राशि प्राप्त होने से मन में कार्य के प्रति सजगता और बढ़ जाती है। कुछ अच्छा और कुछ अलग करने की चाह उत्त्पन्न होने लगती है।
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- मालती देवी ने कहा कि शुरुआत में प्रशिक्षित न होने से काफी दिक्कतें हो रही थीं। फिर प्रशिक्षण मिला और इसके साथ ही हमारी आर्थिक स्थिति सुधरी। बच्चों को पढ़ाने में भी हमारी संस्था मदद करती है।
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