आपातकाल के बाद हुए 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस विरोधी लहर ने रामनिहोर राकेश को दोआबा की सियासत में ठौर बनाने का अवसर दिया। कांग्रेस के अभेद्य दुर्ग रहे तत्कालीन चायल सुरक्षित संसदीय क्षेत्र (अब कौशाम्बी) से भारतीय लोक तांत्रिक दल से उन्होंने किस्मत आजमाई।
कौशाम्बी की सियासत में राम निहोर राकेश ने तीन दशक से ज्यादा समय तक सक्रिय रहे, जाे अपने आप में रिकाॅर्ड रहा। वर्ष 1977 से लेकर 2009 तक हुए 10 चुनाव में रामनिहोर ने आठ बार किस्मत आजमाई। इनमें से तीन बार वह सांसद बनने में कामयाब रहे। जबकि, पांच चुनाव में उन्हें शिकस्त का सामना करना पड़ा।
आपातकाल के बाद हुए 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस विरोधी लहर ने रामनिहोर राकेश को दोआबा की सियासत में ठौर बनाने का अवसर दिया। कांग्रेस के अभेद्य दुर्ग रहे तत्कालीन चायल सुरक्षित संसदीय क्षेत्र (अब कौशाम्बी) से भारतीय लोक तांत्रिक दल से उन्होंने किस्मत आजमाई। जबकि, कांग्रेस ने अपने सिटिंग सांसद छोटेलाल को मैदान में उतारा।
संसदीय क्षेत्र की जनता ने कांग्रेस के खिलाफ मतदान कर पहली बार रामनिहोर राकेश को सांसद चुना था। इसके बाद 80 के मध्यावधि चुनाव में रामनिहोर पाला बदलकर इंदिरा गुट में शामिल हो गए। इस चुनाव में वह कांग्रेस आई के टिकट पर सांसद निर्वाचित हुए। वर्ष 1984 के चुनाव में पाला बदलने का दांव रामनिहोर के लिए भारी पड़ गया।
एलकेडी के टिकट पर चुनावी समर में उतरे रामनिहोर को कांग्रेस प्रत्याशी बिहारी लाल शैलेश से पराजित होना पड़ा था। वर्ष 1989 के चुनाव में उन्होंने फिर कांग्रेस का दामन थाम कर किस्मत आजमाई और सफल हुए। इसके बाद वह फिर कभी चुनाव नहीं जीत सके।वर्ष 1996 और 2004 को छोड़ वर्ष 2009 तक हुए सभी लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के टिकट से चुनावी समर में उतरे रामनिहोर राकेश को हर बार पराजय का मुंह देखना पड़ा। शिकस्त दर शिकस्त के बावजूद वह संसदीय क्षेत्र की जनता के बीच सक्रिय रहे।