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बसपा के कैडर मतों को नहीं ‘जीत’ सके इंद्रजीत 

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कौशाम्बी - फोटो : kaushambi
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लोकसभा चुनाव में सपा गठबंधन प्रत्याशी इंद्रजीत सरोज बसपा के कैडर वोटों को सहेजने में नाकाम रहे। पार्टी सुप्रीमो मायावती से सरोज की तल्खी के कारण चुनाव में बसपाई मतों का खूब बिखराव हुआ। जिसका खामियाजा गठबंधन उम्मीदवार को करारी शिकस्त के रूप में चुकाना पड़ा। 

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 इस बार के लोकसभा चुनाव में कौशाम्बी ससंदीय सीट से सपा ने अपने राष्ट्रीय महासचिव इंद्रजीत सरोज को गठबंधन उम्मीदवार बनाया था। प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री इंद्रजीत का कौशम्बी की सियासत में तकरीबन दो दशक तक एक छत्र राज था। जिले की सदर विधानसभा से चार बार विधायक रह चुके इंद्रजीत 2017 में विस चुनाव के बाद बसपा छोड़कर सपा में शामिल हुए थे। बसपा से अलग होने के दौरान पार्टी सुप्रीमो मायावती से उनकी तगड़ी तल्खी हो गई थी। इसी के कारण सपा से गठबंधन होने के बावजूद वह इंद्रजीत सरोज को प्रत्याशी बनाने के पक्ष में नहीं थी। टिकट कटने की आशंका में आननफानन इंद्रजीत ने बगैर किसी शोर-शराबे के पहले ही दिन कलक्ट्रेट पहुंचकर नामांकन कर दिया था। सियासी सूत्रों की मानें तो टिकट नहीं कटने पर पार्टी सुप्रीमो मायावती ने कौशाम्बी में मौजूद अपने लोगों को एक खास संदेश भेजा था। इतना ही नहीं बसपा के 30 साल के सियासी सफर में पहली बार ऐसा हुआ जब किसी लोकसभा अथवा विधानसभा चुनाव में वह प्रचार करने के लिए कौशाम्बी नहीं आईं।

इसका असर रहा कि जिले में मौजूद कद्दावर बसपाई भी चुनाव में दूरी बनाए रहे। बसपा जिलाध्यक्ष महेंद्र गौतम को केवल एक मर्तबा चंद मिनटों के लिए पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की जनसभा में मंच पर देखा गया था। दूसरी तरफ सपा गठबंधन प्रत्याशी इंद्रजीत ने बसपाइयों को साथ लाने की खास जरूरत भी नहीं महसूस की। दरअसल, 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद कौशाम्बी संसदीय क्षेत्र से सपा को 288746 व बसपा को 201196 वोट मिले थे। दोनों दलों के  वोट साथ आने पर मतों की संख्या 489942 हो जाती है। सियासी जानकारों का मानना था कि चुनाव जीतने के लिए तकरीबन साढ़े तीन लाख मतों की ही जरूरत पड़ेगी। लिहाजा मठाधीशों को मनाने की जरूरत नहीं समझी गई। नतीजतन बसपा के कैडर वोटर बिखर गए। नतीजा सबके सामने है। 

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