यूक्रेन के खारकीव शहर में फंसा कौशाम्बी के मेडिकल छात्र प्रमोद सिंह ने दूतावास से संदेश मिलते ही हॉस्टल छोड़ दिया। वह यूक्रेन के समयानुसार मंगलवार की सुबह छह बजे दो डिग्री तामपान में 12 किमी पैदल चलकर रेलवे स्टेशन पहुंचने में कामयाब हो गया। यहां से वह ट्रेन में आगे के सफर के लिए सवार भी हो गया। उसके साथ 150 छात्र-छात्राएं भी ट्रेन में सवार हैं। सबको उम्मीद है कि वे अब असुरक्षित इलाके से सकुशल बाहर निकलने में कामयाब हो जाएंगे। उन्हें ट्रेन में 12 घंटे का सफर करना होगा।
रूसी सैनिकों के ताबड़तोड़ हमले से यूक्रेन का खारकीव शहर पिछले छह दिनों से दहल रहा है। इस शहर में कौशाम्बी के सिराथू तहसील के चकमानिकपुर सैयदराजे गांव का प्रमोद सिंह भी फंसा हुआ था। वह यूक्रेन में अपनी मेडिकल की पढ़ाई करने गया है और एमबीबीएस प्रथम वर्ष का छात्र है।
परिजनों का कहना है कि प्रमोद ने पहले सेमेस्टर में अच्छे अंक हासिल किए है। यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद प्रमोद की जान संकट में फंसी हुई थी। प्रमोद ने अमर उजाला को बताया कि उसे भारतीय दूतावास से भोर में जल्द से जल्द खारकीव शहर छोड़ देने का संदेश आया। संदेश मिलते ही वह अपने 150 साथियों के साथ बंकर से बाहर निकला। कड़ाके की ठंड में 12 किमी पैदल चलकर रेलवे स्टेशन पहुंचा।
स्टेशन पहुंचकर आगे का सफर करने के लिए एक ट्रेन में सवार भी हो गया। यह ट्रेन कीव होते हुए जाएगी। सफर पूरा करने में 12 घंटे का समय लगने की उम्मीद है। युद्ध की वजह से ट्रेन पहुंचने में देरी भी हो सकती है। वह भारतीय दूतावास से मिल रहे संदेश के आधार पर ही आगे बढ़ रहा है। परिजनों का कहना है कि भगवान ने उनकी सुन ली है। उनका बेट खतरे से बाहर निकल आया है। 12 घंटे बाद स्थिति और साफ हो जाएगी।
प्रमोद के परिजनों से मिलने गए तहसीलदार
मंगलवार को डीएम सुजीत कुमार के निर्देश पर तसहीलदार संतोष सिंह यूक्रेन में फंसे प्रमोद सिंह के परिजनों से मिलने चकमानिकपुर सैयदराजे पहुंचे। उन्होंने प्रशासन की तरफ से परिजनों को आश्वस्त किया कि सरकार प्रभावित परिवार के साथ है। मदद के लिए रात-दिन प्रयास जारी है। तहसीलदार ने बताया कि हर स्तर पर वहां फंसे छात्रों को सकुशल निकालने के लिए प्रयास चल रहे हैं। प्रमोद सिंह का नाम भी सरकार की सूची में है। परिजन सरकार पर भरोसा रखें। अपका बेटा जल्द अपके पास होगा।
भगवान के साथ सरकार पर पूरा भरोसा
प्रमोद के पिता वीरेंद्र सिंह का कहना है कि प्रशासन लगातार उनके संपर्क में है। मंगलवार को तहसीदार भी आए थे। उन्होंने भी भरोसा दिया है कि जल्द उनका बेटा घर आ जाएगा। बेटे ने भी बताया कि वह ट्रेन में सवार होकर आगे बढ़ रहा है। उन्हें भगवान के साथ सरकार पर पूरा भरोसा है।
यूक्रेन त्रासदी : बिस्किट, नमकीन और चिप्स खाकर तीन दिन से जिंदा है मेडिकल छात्र साकिब
यूक्रेन में फंसे मंझनपुर के रहने वाले साकिब महमूद ने मंगलवार दोपहर परिवार से बात कर अपना दर्द साझा किया। साकिब ने बताया कि तीन दिन से वह दूतावास में चिप्स, बिस्किट और नमकीन खाकर जिंदा है। दूतावास के लोगों ने उसे ट्रेन से पोलैंड बार्डर तक जाने के लिए भेजा है। साकिब के साथ तीन सौ और छात्र हैं जो एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे थे। बेटे के युद्धग्रस्त क्षेत्र में फंसे होने से परिवार के लोग परेशान हैं।
नगर पालिका मंझनपुर स्थित पुरानी मस्जिद के पास रहने वाले साकिब महमूद ने वर्ष 2016 में भरवारी के एनडी कॉलेज से इंटर पास किया था। दो साल उसने कानपुर में रहकर नीट की तैयारी की। इसके बाद उसने यूक्रेन के कीव शहर के पास स्थित मेडिकल कॉलेज में दाखिला ले लिया। इन दिनों वह एबीबीएस तृतीय वर्ष का छात्र है।
साकिब के पिता आबिद महमूद ने बताया कि उनके बेटे ने मंगलवार दोपहर फोन पर परिवार से बात की। बताया कि यहां खाने को कुछ नहीं मिल रहा है। वह लोग बिस्किट, नमकीन और चिप्स खाकर जिंदा हैं। साकिब के मुताबिक भारतीय दूतावास की मदद से वह मंगलवार को पोलैंड बार्डर जाने के लिए ट्रेन में सवार हो गया। साकिब ने बताया कि उसके साथ तीन सौ और छात्र भी हैं। मंगलवार शाम या बुधवार सुबह तक पोलैंड पहुंचने की उम्मीद हैं। आबिद ने बताया कि बेटे की बेबसी उनसे देखी नहीं जा रही है। व्हाटसएप पर वीडियो काल करके साकिब ने खुद और अपने दोस्तों की हालत दिखाई है। परिवार के लोग उसके सकुशल घर वापसी की दुआ कर रहे हैं।
24 फरवरी को घर वापसी के लिए बुक था टिकट और हो गया युद्ध
साकिब के पिता आबिद महमूद ने बताया कि उनकी दो बेटियां सानिया महमूद, सारा महमूद के अलावा इकलौता बेटा साकिब है। साकिब ने पहले ही फोन करके बताया था कि यूक्रेन व रूस के बीच कुछ गड़बड़ है। वह घर आना चाहता था, लेकिन कॉलेज से अवकाश नहीं मिला। काफी प्रयास के बाद अवकाश मिला तो परिवार के लोगों ने 24 फरवरी को उसके वतन वापसी का टिकट बुक कराया। साकिब कीव फ्लाइट पकड़ने के लिए पहुंचा तभी युद्ध छिड़ गया।
कम फीस होने के कारण मेडिकल का कोर्स करने जाते हैं छात्र
साकिब के पिता आबिद महमूद ने बताया कि यूक्रेन में एमबीबीएस की एक साल की पढ़ाई की फीस करीब तीन लाख है। इसके अलावा हॉस्टल आदि का खर्च करीब दो लाख रुपये आते हैं। देश के मेडिकल कॉलेजों में यही खर्च करीब 10 से 15 लाख आता है। इस वजह से लोग यूक्रेन में एमबीबीएस करने को ज्यादा तरजीह देते हैं। आबिद ने बताया कि कोरोना के कारण साकिब यहीं रहकर ऑनलाइन पढ़ाई करता था। कोरोना संक्रमण थमने के बाद करीब छह महीने पहले ही वह यूक्रेन गया था।
यूक्रेन में फंसे छात्र अनुराग सिंह का फोटो- फोटो : KAUSHAMBI
गोविंदपुर गांव में छात्र अनुराग सिंह के परिजनों से बात करती तहसीदार चायल दीपिका सिंह- फोटो : KAUSHAMBI