UP Lok Sabha Phase 4 Election: औरेया की बिधूना और कानपुर देहात की रसूलाबाद पर सबकी निगाहें हैं। सदर और छिबरामऊ में सीधी टक्कर है। जबकि तिर्वा में दांव-पेच पर जोर है।
लोकसभा चुनाव निपट चुका है। कन्नौज संसदीय क्षेत्र की जनता ने अपना फैसला सुना दिया है। उनका फैसला ईवीएम में कैद होकर सुरक्षा के घेरे में है। अब चार जून को ये तय होगा कि इत्रनगरी का सांसद कौन होगा, हालांकि यह तय है कि सपा और भाजपा में इस सीट पर जोरदार टक्कर देखने को मिली। बसपा सिर्फ मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने में ही जुटी रही।
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सपा जहां अपने इस गढ़ पर फिर से काबिज होने के लिए जोर लगाती दिखी तो भाजपा अपनी पिछली कामयाबी को दोहराने की कोशिश में रही। इन दोनों की लड़ाई में बसपा मैदान से बाहर दिखी। सपा और भाजपा की आमने-सामने की टक्कर में बसपा सिर्फ अपने काडर वोट तक ही सीमित दिखी। अखिलेश यादव के खुद मैदान में उतरने से सपा और उसके कार्यकर्ताओं का बढ़ा हुआ मनोबल वोटर को बूथ तक लाने में कामयाब दिखा। पिछली बार नजदीकी मुकाबले में भाजपा से मिली हार की कसक को दूर करने के लिए सपा ने खूब जोर दिखाया।
अखिलेश यादव के मैदान में आने से यहां सपा सदर विधानसभा और छिबरामऊ विधानसभा में बेहतर हालत में दिखी, हालांकि इन दोनों ही सीट पर कई जगह भाजपा का खूब जोर दिखा। तिर्वा सीट पर भी सपा और भाजपा में कड़ी टक्कर की खबर है। भाजपा के सुब्रत पाठक अपनी कामयाबी दोहराने के लिए लगातार क्षेत्र में रहे। बूथों पर उसका असर दिखा है। सिर्फ चुनाव के ही दौरान मैदान में उतरने वाली बसपा इस बार सिर्फ किसी करिश्मे की ही उम्मीद में दिखी।
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कन्नौज सदर: अपने गढ़ में बढ़त पर दिखी सपा, भाजपा भी लगाती रही जोर
लोकसभा चुनाव में कन्नौज संसदीय सीट की पांच विधानसभा सीटों में से सदर विधानसभा के वोटरों ने खूब जोश दिखाया। इस सीट के सभी 485 पोलिंग बूथ पर सोमवार सुबह से ही लोकतंत्र का त्योहार मनाने के लिए लाइन लगी रही। वोटर के हुजूम का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पहले दो घंटे में ही इसी विधानसभा के वोटर ने सबसे ज्यादा 15.38 फीसदी वोटिंग की। शहर के एसबीएस इंटर कॉलेज में बने बूथों पर महिला व पुरुषों की बराबर-बराबर लाइन दिखी।
छिबरामऊ विधानसभा:
विधानसभा और लोकसभा में अलग रहता है मिजाज, कायम दिखा रिवाज
कन्नौज संसदीय सीट की पांच विधानसभा सीटों में से सबसे बड़ी विधानसभा सीट का रुतबा रखने वाली छिबरामऊ विधानसभा सीट पर भी सोमवार को बंपर वोटिंग हुई। सपा और भाजपा के बीच सीधी टक्कर से यहां दोनों खेमें में कई बार झड़प भी हुई। इस सीट पर विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में वोटर का अलग मिजाज दिखता है। पिछले चार चुनाव से यही पैटर्न दिख रहा है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा को बढ़त मिली थी। जबकि 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा कामयाब हुई थी। ऐसे में इस बार वोटर किसके पक्ष में फैसला सुनाते हैं, इस पर सभी की निगाह रही। ब्राह्मण, यादव और मुस्लिम की बड़ी संख्या वाली इस सीट पर यह वोटर परंपरागत रूप से पुराने अंदाज में ही वोटिंग करते दिखे। गैर यादव पिछड़ी जातियों के वोटर में सपा और भाजपा के बंटवारा होता दिखा।
तिर्वा विधानसभा:
तिर्वा पर रही सबकी नजर, छाया रहा लोधी फैक्टर
कन्नौज संसदीय सीट के तहत जो पांच विधानसभा सीट हैं, उसमें जिले में पड़ने वाली तीन सीट में तिर्वा सीट सबसे छोटी है। ग्रामीण इलाकों की बहुलता वाली इस सीट के मतदाताओं ने सोमवार को खूब उत्साह दिखाया। यह क्षेत्र हर बार भाजपा के लिए राह आसान करता रहा है। पिछले दो विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में भाजपा को यहां बड़ी कामयाबी मिलती रही है। इस बार भी भाजपा को इस क्षेत्र से काफी उम्मीदें हैं। चुनाव के एलान के ठीक पहले तिर्वा कस्बे में स्थापित हुई रानी अवंतीबाई लोधी की प्रतिमा से जुड़े विवाद से भाजपा पीछा छुड़ाती दिखी। लोधी समाज की नाराजगी का फायदा उठाने के लिए सपा की ओर से कई दांव चले गए हैं। कुछ जगहों पर यह दांव कारगर भी होता दिखा। पिछड़ी जाति बहुल इस विधानसभा क्षेत्र में गैर यादव वोटर एक ही धारा में बहते नहीं दिखे।
बिधूना विधानसभा:
बिधूना में भी बंपर वोटिंग से बढ़ीं नेताओं की उम्मीदें
कन्नौज जिले की तिर्वा सीट और औरेया की बिधूना सीट की सीमाएं एक-दूसरे से मिलती हैं। इसलिए इस सीट का मिजाज भी कुछ-कुछ तिर्वा की ही तरह है। पिछड़ा बहुल इस सीट पर यादव सबसे बड़ी आबादी जरूर है, लेकिन यहां लोधी और शाक्य बिरादरी का दबदबा है। यही वजह है कि विधानसभा चुनाव के दौरान ज्यादातर पार्टियां इन्ही दो बिरादरी के चेहरों पर ही दांव लगाती हैं। इस बार लोकसभा चुनाव के दौरान इन्ही दोनों बिरादरी के वोटरों पर सपा और भाजपा दोनों की ही नजर टिकी है। इसके अलावा सपा को अपने परंपरागत यादव और मुस्लिम वोटरों पर भरोसा है तो भाजपा यहां सवर्ण में बड़ी आबादी वाले क्षत्रिय बिरादरी को लुभाने में लगी रही।
रसूलाबाद
सबसे छोटी सीट ने बढ़ाई सपा-भाजपा की धुकधुकी
2007 में हुए परिसीमन के बाद 2009 में पहला लोकसभा चुनाव हुआ तो कन्नौज संसदीय सीट से इटावा की भरथना को हटाकर कानपुर देहात की रसूलाबाद सीट को शामिल कर लिया गया। यह सीट सपा को हमेशा ही टेंशन देती रही है। पिछले दो विधानसभा चुनाव में इस सीट से भाजपा को जीत मिल रही है। लोकसभा चुनाव में यह सीट हर बार अपना मिजाज बदल लेती है। 2019 में यहां भाजपा को बढ़त मिली थी, तो 2014 में यहां सपा को लीड मिली थी। ऐसे में इस सीट पर दोनों ही पार्टियों ने खूब जोर लगाया है। बसपा को भी इस सीट से काफी उम्मीदें हैं। यहां के 384 बूथों पर सुबह से ही लाइन लगनी शुरू हो गई थी। इस सीट पर बढ़त लेने का दावा तीनों दल सपा, भाजपा और बसपा की ओर से किया जा रहा है।