राजधानी लखनऊ और रायबरेली की सीमा से सटा पुरवा विधानसभा क्षेत्र भाजपा के लिए चुनौती बना है। अब तक 17 चुनाव हो चुके हैं लेकिन भाजपा का जीत का खाता नहीं खुला है। 2017 में जब जिले की पांच सीटों पर भगवा फहराया तो पुरवा ही एकमात्र सीट थी जिस पर बसपा ने जीत दर्ज की थी। इस बार भी भाजपा के लिए यहां कमल खिलाने की बड़ी चुनौती है।
कभी पुरवा विधानसभा सीट कांग्रेस व सपा के लिए सुरक्षित मानी जाती थी। यहां की जनता ने इन दोनों पार्टियों को बराबर-बराबर मौका दिया। दोनों पार्टियों के उम्मीदवारों को पांच-पांच बार जिताकर विधानसभा भेजा। कांग्रेस और सपा ने 25-25 साल तक इस सीट पर अपना कब्जा बनाए रखा। बीच के कुछ चुनावों में निर्दलीय और जनता दल ने कब्जा किया।
भाजपा एक जीत दर्ज करने के लिए तरस गई। हालांकि पार्टी कई चुनाव में रनर रहीं लेकिन जीत का आंकड़ा नहीं छू पाई। 2017 में भाजपा की लहर में भी बसपा के टिकट पर चुनावी मैदान में उतरे अनिल सिंह ने यहां पर जीत का परचम लहराया था। हालांकि वर्तमान समय में अनिल भाजपा में हैं।
सपा का रहा पांच बार लगातार कब्जा
1993 में सपा ने पुरवा विधानसभा सीट पर जीत का सिलसिला शुरू किया था। इसके बाद पार्टी ने लगातार पांच चुनावों में जीत की हैट्रिक लगाई। शायद इसी कारण पुरवा सीट सपा के लिए सबसे मजबूत सीटों में शुमार मानी जाती है। सपा मुखिया मुलायम सिंह विधानसभा चुनाव में अपनी पहली चुनावी रैली की शुरुआत यहीं से करते रहे हैं। यह बात अलग है कि पुरवा को कभी कैबिनेट में जगह नहीं मिल पाई।