विधानसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाता अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं। मुस्लिम समाज के लोग सभी की प्रशंसा कर रहे हैं, लेकिन मतदान किधर करेंगे, यह नहीं बता रहे। उनका रुख स्पष्ट न होने से पक्ष-विपक्ष दोनों आकलन नहीं कर पा रहे हैं। यही कारण है कि ध्रुवीकरण की कोशिश सफल नहीं हो पा रही है।
अब तो मुस्लिम समाज यह भी कहने लगा है कि सरकार किसी की बने, उनके हालात नहीं बदलने वाले। भाजपा की पांच साल की सरकार देख ली और इसके पहले तमाम कथित सेक्युलर दलों का भी शासन देखा है। उनकी जीवनशैली पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। वे एआईएमआईएम प्रमुख असदउद्दीन ओवैसी की बुराई भी नहीं सुनते हैं।
ओवैसी को भाजपा की बी टीम बताने वाले मुस्लिम भी वे लोग हैं, जो किसी न किसी सियासी दल से जुड़े हैं। आम मुसलमान ओवैसी का विरोध नहीं कर रहा है।
सपा-कांग्रेस के नेताओं में ज्यादा बेचैनी
शहरी क्षेत्र की कैंट, आर्यनगर और सीसामऊ सीटों में सपा व कांग्रेस की बेचैनी ज्यादा दिख रही है। वजह यह है कि दोनों ही पार्टियों को उम्मीद है कि मुस्लिम वोट उन्हें मिलेगा, लेकिन खुले मंच से मुस्लिमों का हितैषी होने का दम भी नहीं भर पा रहे। हालांकि, जानकारों का मानना है कि यहां पार्टी को मजबूत देखकर नहीं, बल्कि उम्मीदवार का आकलन कर मुस्लिम वोटर मतदान करेंगे।
वह जहां भी वोट करेगा, आखिरी समय तक आकलन करने के बाद एकतरफा वोटिंग करेगा। इसके लिए मुस्लिम वोटर जाना भी जाता है। यही कारण है कि एआईएमआईएम और उसके नेता की कही हर बात का समर्थन करता है, लेकिन उसको वोट देने के लिए भी अभी हामी नहीं भर रहा है। इसी चुप्पी की वजह से सियासी दलों में बेचैनी है।
नूर एजुकेशनल फाउंडेशन के सचिव और शिक्षाविद शाहिद कामरान खान कहते हैं कि मुस्लिम समाज के लोग आमतौर पर एकतरफा वोटिंग करने में ही माहिर हैं। इस बार शहर का मुसलमान पार्टी नहीं, बल्कि मजबूत उम्मीदवार को देखकर मतदान करेगा।
चौराहे पर खड़ा मुसलमान, वोट देने को बेकरार
फैज-ए-आम इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य और चिंतक मास्टर मोईनुल इस्लाम कहते हैं कि सियासी माहौल में मुस्लिम चौराहे पर खड़ा है। खामोश तो है, लेकिन वोट देने के लिए आतुर भी है। जिस चौराहे पर मुस्लिम खड़े हैं, वहां से कई सियासी दलों के रास्ते जाते हैं। वह मुस्लिम किसी एक दल को भरपूर वोट देता है।
उसकी कोई शर्त नहीं होती, बस एक सियासी दल को हराने के लिए कथित सेक्युलर दलों के हाथों इस्तेमाल होता है। मुस्लिम हमेशा खामोश वोटर कहलाएगा, जब तक उसकी कोई अपनी सियासी जमात नहीं होगी। पहले अपनी सियासी हैसियत बनाएं, फिर सत्ता में आने वाले दलों से हिस्सेदारी करें।
यही वजह है कि एक से पांच और आठ प्रतिशत समाज वाले लोग खुलकर अपनी रणनीति बना लेते हैं और हिस्सा मांगते हैं। 20 प्रतिशत वाला मुस्लिम वोटर, जिसका पार्टियां नाम भी नहीं ले रही हैं, वह सिर्फ खामोशी से वोट देने के लिए बेकरार है।