नोटबंदी के बाद ढाई लाख से अधिक हजार व पांच सौ के नोट जमा करने पर आयकर की जांच के भय से जनधन खातों को बचत खाते में बदलवाने का खेल शुरू हुआ। इनकम डिक्लेरेशन स्कीम से डरे धन्नासेठों ने मौके की नजाकत को भांपकर ग्रामीणों, किसानों, गरीबों, मजदूरों और श्रमिकों को बरगलाया। फिर समूह में सभी को 49 हजार से ढाई लाख रुपये तक जमा करने का ठेका दिया।
जिसके खाते में जितना जमा उसका कमीशन काटकर बाद में लौटाने के वादे के साथ बैंकों में लाइनें लग गईं। देखते देखते गरीबों के जनधन खाते मालामाल हो गए। जब तक बैंकों, आयकर अफसरों और सरकार के नुमाइंदों को इस खेल का अंदाजा लगता तब तक धन्नासेठ अपने मंसूबे में कामयाब हो चुके थे। आखिरकार सरकार को जनधन खाते में रुपया जमा करने की लिमिट तय करनी पड़ी।
जनधन ऐसे बने बचत खाता
जनधन खाते को बचत खाते में बदलवाने का प्रावधान है। इसी के चलते बड़ी संख्या में लोगों ने अपने जनधन को बचत खाते में तब्दील कराया। इससे उनके खातों में जमा करने की लिमिट बढ़ गई। 50 हजार से कम जमा करने पर पैन की अनिवार्यता न होने पर लोगों ने 49 हजार रुपये कई बार जमा कराए। अनुमान से अधिक जमा होने पर पूरे खेल का खुलासा हुआ।
इसलिए खुले थे जनधन खाते
मोदी सरकार से पहले बैंकों में खाता खुलवाना भी किला जीतने से कम नहीं था। ग्रामीण जनता व शहरी गरीबों के पास खुद का बैंक में खाता न होने की वजह सरकार ने इसे आसान बनाया। बिना गारंटर, बिना अधिक लिखा पढ़ी व बिना दस्तावेजों के बैंकों में गरीबों के खाते खुले। उनकी आर्थिक स्थिति को देखते हुए 50 हजार तक जमा करने व 10 हजार रुपये तक निकालने की सुविधा दी गई। बैंक में एप्लीकेशन देकर इसे बचत खाते में तब्दील करवाकर लेनदेन की लिमिट बढ़वाने की भी व्यवस्था की गई।