‘नेताओं में भी मानसिक रोगों के मामले बढ़े हैं। कई नेताओं का तो लगातार इलाज चल रहा है। अचानक उत्तेजित हो जाना, बार-बार मारपीट करना, गाली देना, गलतफहमी होना, कान में तरह-तरह की आवाजें सुनाई देना आदि लक्षणों से कई नेता भी गुजर रहे हैं। इसे सिजोफ्रेनिया कहा जाता है। इसका इलाज मौजूद है।’ यह कहना है रायपुर छत्तीसगढ़ से आए डॉ. प्रकाश नारायण शुक्ल का। डॉ. शुक्ल शनिवार को इंडियन साइकियाट्रिक सेंट्रल जोन की ओर से आयोजित कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे।
डॉ. शुक्ल ने कहा कि देश की आबादी का 25-30 फीसदी हिस्सा किसी न किसी मानसिक रोग से ग्रसित है। इतनी बड़ी आबादी का इलाज करने के लिए देश में पर्याप्त मनोचिकित्सक भी नहीं हैं। देश की सवा अरब की आबादी के बीच सिर्फ 5203 मानसिक रोग विशेषज्ञ ही मौजूद हैं। इससे पूर्व जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के प्रिसिपल प्रो. नवनीत कुमार, सोसाइटी के प्रेसीडेंट व बीएचयू में मानसिक रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. संजय गुप्ता, केजीएमयू लखनऊ में मानसिक रोग विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. प्रभात सिथोले ने कार्यशाला का उद्घाटन किया। इस दौरान डॉ. आरके महेंद्रु, डॉ. एसपी गुप्ता, डॉ. पीके दलाल, डॉ. उन्नति कुमार, डॉ. धनंजय चौधरी, डॉ. विपुल सिंह, डॉ. आरसी सेठ, डॉ. रवि कुमार, डॉ. मधुकर कटियार, डॉ. कलीम अहमद, डॉ. मनीष निगम, डॉ. हरि सिंह आदि मौजूद रहे।
बच्चे की चंचलता को हल्के में न लें
केजीएमयू लखनऊ के मानसिक रोग विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. प्रभात सिथोले ने कहा कि बच्चों की चंचलता को हल्के में नहीं लेना चाहिए। यह अटेंशन डिफिसिएंसी हाइपर एक्टिविटी डिस्ऑर्डर (एडीएचडी) है। इस कारण बच्चे पढ़ाई में पिछड़ने लगते हैं और गलत रास्ते पर जाने लगते हैं। ऐसे बच्चे कम उम्र के बाद भी बाइक, कार जल्दी चलाना चाहते हैं, उग्र व्यवहार करते हैं आदि। दवा से इसका इलाज किया जा सकता है।
गर्भावस्था में बढ़ जाता है डिप्रेशन
डॉ. शशि राय ने कहा कि गर्भावस्था और रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में डिप्रेशन के मामले बढ़ जाते हैं। इन्हें नींद नहीं आती, उलझन बनी रहती है, घबराहट रहती है, किसी काम में मन नहीं लगता है, खुद को नकारा समझने लगती हैं। डिप्रेशन पहली बार सामने आने पर कुछ दिनों के इलाज से इसे ठीक किया जा सकता है। किसी को बार-बार डिप्रेशन की बीमारी हो जाती है तो उसका लंबा इलाज चलता है।