कुमाऊं संघ का वार्षिक उत्सव ‘उत्तरैणी 2016’ रविवार को लाजपत भवन में मनाया गया। समारोह में मुख्य अतिथि सांसद एवं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी ने संस्था को कानपुर में कुमाऊं भवन बनाने के लिए 5 लाख रुपये देने की घोषणा की।
उन्होंने कुमाऊं और गढ़वाली समाज को एकता की मिसाल बताया। कहा कि हम अपनी संस्कृति की तरह हर समाज और शहर में घुलमिल जाते हैं। उन्होंने शपथ दिलाई कि भाजपा वरिष्ठ अटल बिहारी वाजपेयी ने उत्तराखंड दिया है अब इसे चमकाने की बारी हमारी है। कोश्यारी ने युवाओं को संस्कृति से जोड़े रखने की अपील भी की।
इससे पहले उन्होंने विशिष्ट अतिथि भाजपा जिलाध्यक्ष सुरेंद्र मैथानी, विधायक सत्यदेव पचौरी और संघ के पदाधिकारियों के साथ दीप जलाकर कार्यक्रम का उद्घाटन किया।
उधर, समाज के बच्चों और महिलाओं ने कुमाऊंनी संस्कृति पर गणेश वंदना और देवी वंदना पेश की। इसके बाद ‘बागेश्वरी की बिमला छोरी तीन धारो बोला’ गीत पर परंपरागत झोड़ा नृत्य, झवड़ और पर्वतीय लोकगीत ‘कान में डबल झुमका’ पर नृत्य किया। बबिता, मीनाक्षी, अंजली, गुनगुन, ऐशी सिंह, चित्रा और माया की प्रस्तुति सुंदर रही।
नारामऊ में कुमाऊं भवन बनाने की मांग भी की गई। राष्ट्रीय कर्मचारी पेंशनर्स एसोसिएशन केपदाधिकारी एसबी शर्मा ने कोश्यारी को ज्ञापन भी दिया। कार्यक्रम में गोपाल कृष्ण पांडेय, अध्यक्ष भारत भूषण पांडेय, महामंत्री हर्ष सिंह नेगी, उपाध्यक्ष डीके आर्या, डॉ. निर्मला जोशी, जगदीश हयात और कार्यक्रम संयोजक बलवंत सिंह फर्तियाल मौजूद रहे।
गंगा में जितना पानी बचा है उसे स्वच्छ रखें: कोश्यारी
समारोह में पत्रकारों से मिले कोश्यारी ने गंगा सफाई पर खर्च हुए अरबों रुपये पर कहा कि असल में पैसा गंगा के लिए खर्च नहीं हुआ। बेहतर होगा कि जो पानी गंगा में बचा है हम उसे ही स्वच्छ रखें।
उन्होंने कहा कि मीडिया पता लगाए कि पैसा कहां गया। कोश्यारी ने छात्र रोहित वैमुला की मौत पर कहा कि मामले में राजनीति और सियासत हो रही है। राहुल गांधी को फिजूल की बयानबाजी बंद करनी चाहिए।
ये हैं कुमाऊं समाज
कुमाऊं समाज के लोग नौकरी के सिलसिले में आजादी से पहले पहाड़ों से कानपुर आए थे। आजादी के बाद सन 1960 में इनकी संस्था कुमाऊं संघ का गठन हुआ। संघ के उपाध्यक्ष डीके आर्या की मानें तो शहर में इनके लगभग 2000 परिवार हैं, ये परिवार रामादेवी के भाभा नगर, किदवई नगर, ग्वालटोली, नानकारी और कल्याणपुर क्षेत्र में बसे हैं।
अधिकांश लोग रक्षा संस्थानों, बैंक, सिविल सेवा, प्रशासन और सरकारी नौकरियों में हैं। सावन में इनका साल का सबसे बड़ा ‘हरेला’ त्योहार होता है। इस समाज के लोगों में ग्वेल देवता की पूजा की बड़ी मान्यता है। समाज में डुबक, गहत की दाल, मडुआ की रोटी प्रिय भोजन है।